मशरूम का बिस्कुट और अचार! जमशेदपुर की निहारिका के इस 'सुपरफूड' के मुरीद हुए दिल्ली-हरियाणा के लोग
जमशेदपुर की निहारिका ने 11 महिलाओं के साथ मशरूम की खेती शुरू की, जिससे 500 से अधिक महिलाएं स्वरोजगार से जुड़ी हैं। 20 बैग से शुरू होकर अब 10,000 बैग म ...और पढ़ें

मशेदपुर की निहारिका ने मशरूम बिस्कुट और सेव से देशभर में बनाई पहचान।
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मनोज सिंह, जमशेदपुर। महिलाएं भी अब पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं। चाहे शिक्षा के क्षेत्र हों या खेती किसानी की। ऐसी ही एक महिला के बारे में बता रहे हैं, जो मशरूम के उत्पादन में नवाचार कर लाखों रुपये कमा रही है।
साथ ही 500 से अधिक महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने का काम किया है।यह काम कर रहीं हैं जमशेदपुर के छोटा गोविंदपुर निवासी निहारिका। मशरूम की खेती में इनकी काबिलियत को देखते राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत निहारिका को प्रशिक्षण देने के लिए प्रशिक्षक के तौर पर देश भर में बुलाया जाता है।
निहारिका कहती हैं कि वह सबसे पहले 2019 में 11 महिलाओं को लेकर श्री लक्ष्मी उर्जा समूह बनाईं। जिसके माध्यम से वह धीरे-धीरे अपने सेल्फ हेल्प ग्रुप बनाकर 500 से अधिक महिलाओं को मशरूम की खेती का प्रशिक्षण देकर स्वावलंबन बना चुकी हैं।
निहारिका कहती हैं कि कोरोना काल में सभी काम खोज रहे थे, काम बाहर था नहीं। उन्हें बचपन से किचन गार्डेन का शौक था। उन्होंने घर में ही 20 पैकेट में मशरूम लगाया जो सफल रहा। इसके बाद तो वह पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा।
20 पैकेट से 10000 पैकेट तक का सफर
निहारिका कहती हैं कि 20 पैकेट की मशरूम की खेती में सफल हो गई तब आसपास की अन्य महिलाओं को इसके बारे में जानकारी दीं। सभी को प्रशिक्षित की।जिला बागवानी पदाधिकारी अनिमा लकड़ा का भी बड़ा योगदान है।
उनका मशरूम का उत्पादन सफल रहा। मांग के अनुरूप वह जमशेदपुर के विभिन्न होटलों व बाजारों में भेजने लगी। जब एक-एक पैसे के मोहताज थे, आज खुद 2000 पैकेट मशरूम का उत्पादन कर रही हैं।
जिससे दो महीने में लगभग तीन से चार लाख रुपये का मशरूम बिक्री कर लेती हैं। निहारिका कहती हैं कि उनके ग्रुप के 500 महिलाएं हैं, जो प्रति माह घर बैठे 10 हजार रुपये से अधिक का मशरूम व उसके उत्पाद की बिक्री कर कमा रहीं हैं।
दिल्ली से लेकर हरियाणा तक जाता है मशरूम उत्पाद
निहारिका कहती हैं कि उनके व उनके ग्रुप की महिलाओं द्वारा तैयार किया गया मशरूम व मशरूम के उत्पाद जिसमें बिस्कुट, सेव, बड़ी, आचार की मांग जमशेदपुर से लेकर देश की राजधानी दिल्ली,रांची, हरियाणा के चंडीगढ़, दुमका तक भेजा जा रहा है।
मशरूम की खेती करने में टाटा पावर, टाटा कमिंस का भी योगदान रहा। उन्होंने अपना सीएसआर के तहत शेड का निर्माण कराया। इसके अलावा बागवानी विभाग का भी सराहनीय योगदान रहा। देश में जहां भी सरस आजीविका मेला लगता है, उनका मशरूम वहां जाता है।
मशरूम की खेती पर्यावरण के लिए बेहतर
निहारिका कहती हैं कि मशरूम की खेती पर्यावरण के लिए बेहतर है, क्योंकि यह कृषि अपशिष्ट जैसे पुआल का उपयोग करके कचरे को कम करती है। मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है, कम पानी और जगह लेती है, पशुधन की तुलना में कम ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित करती है और जैव विविधता को बढ़ावा देती है। यही कारण है कि मशरूम की खेती पर्यावरण के लिए बेहतर है।
कभी 100 रुपये के लिए रहती थी मोहताज
श्री लक्ष्मी उर्जा समूह में मशरूम उत्पादन के लिए काम कर रहीं निहारिका का साथ देने के लिए कौशल्या, ज्योति कालुंडिया, आशा कालुंडिया, आरती शामद, बासमती सोय, नीलम बारा, उर्वशी करुआ, गुरुवारी टुडू, दीपिका भगत, गुरुगामनी भगत जैसी महिलाएं कभी 100 रुपये के लिए मोहताज रहती थीं।
आज वह स्वयं सहायता समूह से जुड़कर आत्मनिर्भर बनीं, आर्थिक तंगी से निकलकर अब लाखों का कारोबार कर रही हैं और अन्य महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं। जिन्होंने छोटे ऋण और कौशल से अपनी स्थिति बदली और अब सशक्त उद्यमी बन गई।
भविष्य का लक्ष्य : जिले को मशरूम हब बनाना
निहारिका कहती हैं कि एफपीओ बनाकर पूरे जिले के मशरूम उगाने वाले किसान को एक साथ जोड़ना है। इसका वैल्यू एडिशन करके नेशनल लेवल तक पहुंचना है। मशरूम उगाने के बाद जो बैग बचेगा उसको वर्मी कंपोस्ट बनाकर ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देना है।

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