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    Champai Soren: 'धर्मांतरित और समाज से बाहर शादी....', आदिवासियों के लिए चंपई सोरेन ने कर दी ये बड़ी मांग

    झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने धर्मांतरित आदिवासियों और आदिवासी समाज से बाहर विवाह करने वाली बेटियों को आरक्षण से बाहर करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि अगर डीलिस्टिंग जल्द शुरू नहीं हुई तो आदिवासी समाज का अस्तित्व मिट जाएगा। सोरेन ने संथाल परगना में घुसपैठ और धर्मांतरण पर चिंता जताई और 1967 के डीलिस्टिंग विधेयक को फिर से लाने की बात कही।

    By Birendra Kumar Pandey Edited By: Divya Agnihotri Updated: Fri, 18 Apr 2025 08:56 AM (IST)
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    धर्मांतरित एवं समाज से बाहर शादी करने वालों को आरक्षण से बाहर किया जाए: चंपई सोरेन

    जागरण संवाददाता, बोकारो। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और आदिवासी नेता चंपई सोरेन ने एक बार फिर आदिवासी समाज की अस्मिता और अधिकारों को लेकर बड़ा बयान दिया है। गुरुवार को वे बोकारो के बालीडीह में आदिवासियों के एक कार्यक्रम में शामिल हुए।

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    धर्मांतरण कर चुके आदिवासियों को आरक्षण से बाहर करने की मांग

    यहां सरहुल महोत्सव सह मिलन समारोह में कहा कि धर्मांतरण कर चुके आदिवासियों तथा आदिवासी समाज से बाहर शादी कर चुकी बेटियों को आरक्षण से बाहर करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि अगर जल्द ही डीलिस्टिंग शुरू नहीं की गई तो आदिवासी समाज का अस्तित्व मिट जाएगा।

    चंपई सोरने ने संथाल परगना की स्थिति पर जताई चिंता

    यहां पहुंचकर उन्होंने जाहेरगढ़ में माथा टेक कर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि अगर आदिवासी समाज नहीं जागा तो भविष्य में हमारे इन जाहेरस्थानों, सरना स्थलों एवं देशाउली में पूजा करने वाला कोई नहीं बचेगा। संथाल परगना की स्थिति पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि वहां आदिवासी समाज दोतरफा मार झेल रहा है।

    घुसपैठियों कर रहे आदिवासी लड़कियों से शादी

    एक ओर धर्मांतरित लोग समाज के लिए आरक्षित सीटों पर कब्जा जमाते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बांग्लादेशी घुसपैठिए न सिर्फ आदिवासी समाज की जमीनों पर कब्जा कर रहे हैं, बल्कि हमारे समाज की बेटियों से शादी कर के हमारे सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़ रहे हैं।

    डीलिस्टिंग विधेयक जरूरी

    बाद में उन्हीं बेटियों को निकाय चुनावों में लड़ाकर, ये लोग पिछले दरवाजे से संविधान द्वारा दिए गए आरक्षण में भी अतिक्रमण कर रहे हैं। इसे रोकना आवश्यक है। उन्होंने याद दिलाया कि सन 1967 में आदिवासी नेता कार्तिक उरांव द्वारा संसद में डीलिस्टिंग विधेयक पेश किया गया था, जिसे संसदीय समिति के पास भेजा गया था।

    समिति ने भी यह माना था कि आदिवासी समाज के अस्तित्व को बचाने के लिए डीलिस्टिंग आवश्यक है। उसके बाद 322 सांसदों एवं 26 राज्यसभा सांसदों की सहमति के बावजूद तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इस बिल को ठंडे बस्ते में डाल दिया।

    कांग्रेस को आदिवासियों की तत्कालीन दुर्दशा का जिम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने ना सिर्फ 1961 में आदिवासी धर्म कोड हटाया, बल्कि आदिवासी आंदोलनकारियों पर गोली चलवाने का दुस्साहस भी किया।

    उन्होंने कहा कि जिस आदिवासी समाज ने अपने अस्तित्व एवं आत्म-सम्मान की लड़ाई में अंग्रेजों के सामने के सामने घुटने नहीं टेके, बल्कि संघर्ष का मार्ग चुना, उनके वंशज आज हार कैसे मान सकते हैं।

    बाबा तिलका मांझी, वीर सिदो-कान्हू, पोटो हो, भगवान बिरसा मुंडा एवं टाना भगत के संघर्ष की याद दिलाते हुए उन्होंने युवाओं को उलगुलान की तैयारी में जुट जाने का आह्वान किया।

    तालियों की गड़गड़ाहट एवं नारेबाजी के बीच उन्होंने उपस्थित जनसमूह से खुशखबरी साझा करते हुए कहा कि इस अभियान का अब सकारात्मक परिणाम निकल रहा है।

    कोल्हान के विभिन्न क्षेत्रों में धर्मांतरण कर चुके दर्जनों लोगों ने पिछले हफ्ते ही आदिवासी समाज में घर वापसी की है और सैकड़ों लोगों ने घर वापसी की इच्छा जताई है।

    उन्होंने कहा कि लगातार चल रही इन सभाओं के बाद, संथाल परगना में 10 लाख आदिवासियों का एक महाजुटान होगा, जहां से आदिवासी समाज की इन मांगों को केंद्र सरकार तक पहुंचाया जाएगा।

    स्थानीय लोगों ने झारखंड के पारंपरिक तीर धनुष भेंट की वहीं अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया। इस दौरान आदिवासी महिलाओं व युवतियों ने बाहा गीत व मांदर के थाप पर नृत्यांगान किया।

    इस दौरान जय नारायण मरांडी, कृष्णा हेंब्रम , आनंद मुर्मू,रामलाल सोरेन, मनोज मुर्मू, रघुनाथ टुडू सहित इस कार्यक्रम में स्थानीय जाहेरगढ़ समिति के लोग, भाजपा कार्यकर्ता एवं हजारों की संख्या में आदिवासी समाज के लोग जुटे थे।

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