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    शादी में अब कितने भी मेहमान हो सकेंगे शामिल, हर चीज का उठाएंगे लुत्फ; कोर्ट ने मुफ्ती सरकार की लगाई हर पाबंदियां की रद्द

    By Jagran NewsEdited By: Preeti Gupta
    Updated: Sun, 03 Dec 2023 11:52 AM (IST)

    जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने शादी समारोह में मेहमानों की संख्या और खाने-पीने को लेकर की गई पाबंदियों के आदेश को रद कर दिया है। छह वर्ष पूर्व महबूबा मुफ्ती सरकार ने यह पाबंदियां लगाई थी जिसका लगातार लोग विरोध करते आ रहे थे। कोर्ट ने कहा कि यह आदेश किसी भी नागरिक की निजी स्वतंत्रता और गरिमा को ठेस पहुंचाता है।

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    विवाह समारोह में मेहमानों की संख्या सीमित रखने के आदेश को कोर्ट ने रद्द किया

    जागरण संवाददाता, जम्मू। Jammu-Kashmir News:  जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने शादी समारोह में मेहमानों की संख्या और खाने-पीने को लेकर की गई पाबंदियों के आदेश को रद कर दिया है। छह वर्ष पूर्व सरकार ने यह पाबंदियां लगाई थी, जिसका लगातार लोग विरोध करते आ रहे थे।

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    जस्टिस विनोद चटर्जी कौल ने शादी-विवाह के न्योता के साथ मिठाइयां व ड्राई फ्रूट्स देने, शादी समारोह में डीजे-पटाखे पर रोक, बेटी की शादी में पांच सौ, बेटे की शादी में चार सौ व सगाई पर अधिकतम सौ लोगों को बुलाए जाने के सरकारी आदेश को मौलिक अधिकारों का हनन करार देते हुए खारिज कर दिया है।

    20 फरवरी 2017 में लागू हुआ था आदेश

    इस आदेश को 20 फरवरी, 2017 में खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता मामले विभाग के सचिव ने जारी किया था। इस आदेश के तहत शादी समारोह में फल व मिठाई के दो स्टाल सहित अधिक से अधिक सात स्टाल लगाने का निर्देश दिया गया था।

    साथ ही यह भी आदेश दिया गया था कि समारोह में खाने की बर्बादी नहीं होगी। सरकार के इस आदेश को चुनौती देवे वाली याचिका को कोर्ट में चुनौती दी गई थी, जिस पर याचिका की ओर से एडवोकेट परिमोक्ष सेठ ने अपना पक्ष रखा।

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    कोर्ट ने क्या आदेश सुनाया?

    कोर्ट ने कहा कि यह आदेश किसी भी नागरिक की निजी स्वतंत्रता और गरिमा को ठेस पहुंचा है। जिस अधिनियम के तहत यह आदेश जारी किया गया था, वह नागरिकों को आवश्यक वस्तुएं उचित मूल्य पर उपलब्ध कराने और समान रूप से वितरित करने वाला अधिनियम है।

    लेकिन इस अधिनियम को शादी समारोहों में मेहमानों की संख्या और खाने-पीने की पाबंदी पर लगा दिया गया। इस दलील पर जस्टिस विनोद चटर्जी कौल ने इस आदेश को खारिज करते हुए कहा कि यह आदेश मौलिक अधिकारों का हनन करता है। इसे जबरन नहीं लागू करवाया जा सकता।

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