1.13 करोड़ में बिकीं तीन प्राचीन पेंटिंग्स, मंडी की कला को मिली नई पहचान; जानिए आखिर क्यों है खास
मंडी कलम की तीन दुर्लभ पेंटिंग्स मुंबई के पंडोल नीलामी घर में 1 करोड़ 13 लाख 50 हजार रुपये में बिकी हैं। यह मंडी कलम की ऐतिहासिक महत्ता और इसके पुनर्जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। नीलामी में सबसे अधिक कीमत 80 लाख रुपये की पेंटिंग ने पाई है जिसमें मंडी की होली का चित्रण है। दूसरी पेंटिंग 28 लाख रुपये में बिकी है।
जागरण संवाददाता, मंडी। मंडी की प्राचीन कला मंडी कलम एक बार फिर सुर्खियों में है। मुंबई के प्रतिष्ठित पंडोल नीलामी घर में हुई एक नीलामी में मंडी शैली की तीन पेंटिंग्स एक करोड़ 13 लाख 50 हजार रुपये में बिकी हैं।
यह न केवल मंडी कलम की ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाता है, बल्कि इस विलुप्त होती कला को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है। नीलामी में सबसे अधिक कीमत 80 लाख रुपये की पेंटिंग ने पाई है। इसमें मंडी की होली का जीवंत चित्रण किया गया है। यह पेंटिंग 18वीं सदी की है।
दूसरी पेंटिंग जो 28 लाख रुपये में बिकी है। 17वीं सदी के राजकुमार व एक महिला को पेड़ के पास खड़े हुए दर्शाती है। तीसरी पेंटिंग 5.50 लाख रुपये में नीलाम हुई है। यह भी 18वीं सदी की है। इसमें राजा सिद्धसेन को हुक्का पीते हुए दिखाया गया है। यह सभी पेंटिंग्स उस युग की कलात्मक गहराई और परंपरागत शैली का सजीव चित्रण करती हैं। इससे पहले मंडी शैली के दो चित्र यानी पेंटिंग 3.85 करोड़ रुपये में नीलाम हुई थीं।
पारंपरिक रंगों और बारीकी का अद्भुत संगम
मंडी कलम का इतिहास राजशाही काल से जुड़ा हुआ है। इस शैली की पेंटिंग्स प्राकृतिक रंगों और गिलहरी की पूंछ से बनी तुलिका (ब्रश) का उपयोग कर बनाई जाती थीं। कलाकार वसली कागज पर बारीकियों से कहानियों को उकेरते थे। इस कला की विशेषता यह है कि छोटे आकार की पेंटिंग में पूरी कहानी कहने का प्रयास किया जाता है। पौराणिक कथाओं, रामायण, महाभारत और राजशाही जीवन के चित्रण ने इसे अद्वितीय बना दिया।
मंडी शहर के चित्रकार राजेश कुमार, जो पिछले नौ वर्षों से मंडी कलम पर काम कर रहे हैं, ने इसे कला प्रेमियों द्वारा दिया गया सम्मान बताया। राजेश कहते हैं, यह पेंटिंग्स मंडी की संस्कृति और परंपरा का जीवंत उदाहरण हैं। नीलामी में इनकी ऊंची कीमत ने यह साबित कर दिया कि कला प्रेमी मंडी कलम को कितना महत्व देते हैं।
जीआई टैग की आवश्यकता
मंडी कला एवं टांकरी लिपि के संरक्षक पारूल अरोड़ा ने बताया कि मंडी कलम को भी कांगड़ा शैली की तरह जीआइ टैग मिलना चाहिए। इससे मंडी कलम को वैश्विक स्तर पर एक अलग पहचान मिलेगी। कांगड़ा कलम को जी-20 सम्मेलन में विशेष उपहार के रूप में प्रस्तुत किया गया था।
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