पानी की गंभीर कमी से जूझ रहा हरियाणा, 2032 तक जल सुरक्षित राज्य बनने का लक्ष्य; लाई गई कई योजनाएं
हरियाणा पानी की गंभीर कमी से जूझ रहा है, जबकि वह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को भी पानी देता है। राज्य 2032 तक जल सुरक्षित बनने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। ...और पढ़ें

पानी की कमी वाले राज्य हरियाणा में जल संरक्षण को लेकर गंभीर हुई सरकार (फोटो: जागरण)
राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। गर्मियों में अक्सर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के लोगों की प्यास बुझाने वाला राज्य हरियाणा स्वयं पानी की भारी कमी से जूझ रहा है। अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वाह करते समय हरियाणा को हमेशा यह चिंता लगी रहती है कि अपने राज्य के लोगों की पानी की मांग को कैसे पूरा किया जा सकेगा।
इस चिंता के बीच हरियाणा ने कभी यह नहीं सोचा कि वह दिल्ली को पानी उपलब्ध नहीं कराएगा। दिल्ली की पानी की जरूरत को पूरा करने के साथ ही हरियाणा अब ऐसी व्यवस्था करने में लगा है, ताकि उसके राज्य के लोगों की पानी की मांग को पूरा किया जा सके। इसके लिए उसे जहां अपने पड़ोसी राज्य पंजाब से एसवाईएल का पानी मिलने की आस बरसों से बनी हुई है, वहीं पानी नहीं मिलने की स्थिति में हरियाणा ने जल संरक्षण, अपशिष्ट जल उपचार और जल सुरक्षित राज्य की दिशा में पूरी मजबूती के साथ कदम बढ़ाए हैं।
हरियाणा में करीब 86 प्रतिशत पानी की खपत खेती के काम में होती है। 14 प्रतिशत पानी पीने के काम में आता है। इसलिए सरकार का फोकस ऐसी फसलों का उत्पादन घटाने की तरफ बन रहा है, जिनमें पानी की अधिक खपत होती है। राज्य में धान की खेती को हतोत्साहित करने के साथ ही प्राकृतिक खेती पर जोर दिया जाने लगा है, ताकि किसानों को कम जल में अधिक गुणवत्तापूर्ण फसलें पैदा करने पर ज्यादा आर्थिक लाभ मिल सके।
राज्य में इस समय 35 लाख करोड़ लीटर पानी की मांग के विपरीत सिर्फ 21 लाख करोड़ लीटर पानी की आपूर्ति हो पा रही है। यानी हर साल 14 लाख करोड़ लीटर पानी की कमी रहती है। खासकर कृषि और भूजल स्तर गिरने के कारण ऐसी स्थिति बनी है। राज्य के कई जिलों में भूजल स्तर काफी नीचे चला गया है। राज्य के तीन दर्जन से अधिक ब्लाक डार्क जोन में आ चुके हैं, जहां पानी 200 से 450 फुट नीचे तक मिल पा रहा है।
पंजाब के साथ भाखड़ा नहर के पानी को लेकर विवाद का अभी तक समाधान नहीं हो पाया है। नतीजतन हरियाणा को आवंटित 9500 क्यूसेक पानी की आपूर्ति नहीं हो रही है। पानी की बचत के लिए सरकार ने धान की फसल के स्थान पर अन्य फसलें उगाने वाले किसानों को सात से नौ हजार रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन राशि देने का निर्णय लिया है। राज्य को ''जल सुरक्षित'' बनाने के लिए ''अमृत जल क्रांति'' और ''वाटर स्मार्ट स्टेट'' योजनाओं पर तेजी से काम चल रहा है।
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की देखरेख में राज्य में जल शक्ति अभियान को गति देने का निर्णय लिया गया है। केंद्र सरकार के सहयोग से ''कैच द रेन 2025'' जैसे अभियानों के माध्यम से जल संरक्षण और वन संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है, जिसे जल जीवन मिशन के साथ जोड़ा गया है।
वाटर सिक्योर हरियाणा कार्यक्रम के अंतर्गत विश्व बैंक की मदद से 5700 करोड़ रुपये की योजना पर सरकार काम कर रही है, जिसके अंतर्गत राज्य को 2032 तक देश का पहला जल सुरक्षित राज्य बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें 14 रणनीतिक सिंचाई क्लस्टर शामिल हैं।
जल संरक्षण के क्षेत्र में हरियाणा को हाल ही में केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय द्वारा छठे राष्ट्रीय जल पुरस्कारों में ''सर्वश्रेष्ठ राज्य'' श्रेणी में तीसरा स्थान प्राप्त हुआ है, जिसने राज्य के जल संरक्षण, सिंचाई प्रबंधन और भूजल पुनर्भरण के प्रयासों पर राष्ट्रीय स्तर पर मुहर लगाई है। यह पुरस्कार राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा राज्य की सिंचाई एवं जल संसाधन मंत्री श्रुति चौधरी को प्रदान किया गया।
महाराष्ट्र और गुजरात के बाद हरियाणा को यह पुरस्कार मिला है, जिसका मतलब स्पष्ट है कि जल संरक्षण की दिशा में राज्य सरकार के जो प्रयास किए जा रहे हैं, वह धरातल पर हैं और उनमें जनभागीदारी पूरी तरह से बनी हुई है।
हरियाणा में पानी की बर्बादी रोकने के लिए सरकार ने कानून और नीतियां बनाई हैं। इनमें हरियाणा जल संसाधन (संरक्षण, विनियमन और प्रबंधन) अधिनियम 2020 प्रमुख है, जो जल संरक्षण को अनिवार्य बनाता है, साथ ही पानी की चोरी और बर्बादी पर जुर्माना लगाने और कनेक्शन काटने का प्रविधान करता है। राज्य में अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग की नीति (2019) भी लागू है।
केंद्रीय स्तर पर पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 के तहत भी पीने योग्य पानी की बर्बादी पर पांच साल तक की कैद या जुर्माना लग सकता है। राज्य की नगर पालिकाओं को अपशिष्ट जल का कम से कम 25% पुन: उपयोग करने का लक्ष्य दिया गया है। शहरी जल नीति (2012) के अंतर्गत खुले नलों और बिना मीटर कनेक्शन से पीने के पानी की बर्बादी रोकने के लिए मीटर रहित कनेक्शन पर भारी जुर्माना और कनेक्शन काटने का प्रविधान है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण के निर्देशों के तहत भूजल से प्राप्त पीने योग्य पानी की बर्बादी या दुरुपयोग पर पांच साल तक की कैद या एक लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इसका उल्लंघन जारी रहने पर प्रतिदिन अतिरिक्त जुर्माना लग सकता है।

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