विपक्ष के नेता के संकट से जूझ रही है कांग्रेस, हुड्डा को छोड़ किसी और को जिम्मेदारी देने के मूड में हाईकमान
हरियाणा में विपक्ष के नेता के चयन में कांग्रेस की गुटबाजी ने पार्टी को कमजोर कर दिया है। एक रिपोर्ट में सामने आया है कि अगर हुड्डा और सैलजा मिलकर चुनाव लड़ते तो कांग्रेस की वापसी हो सकती थी। गुटबाजी को छिपाने के लिए कांग्रेस हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ रही है। वहीं भाजपा अपनी जीत से उत्साहित है और सदस्यता अभियान में जुटी है।

अनुराग अग्रवाल, चंडीगढ़। हरियाणा के विधानसभा चुनाव में 55 लाख से अधिक वोट हासिल कर तीसरी बार सत्ता में आई भाजपा जहां पार्टी के सदस्यता अभियान के नवीनीकरण में पूरी ताकत से जुटी है, वहीं आपसी गुटबाजी के चलते सत्ता के करीब होते हुए भी बहुत दूर हो चुकी कांग्रेस के सामने विपक्ष के नेता के चयन का संकट बना हुआ है।
कांग्रेस हाईकमान हरियाणा में विपक्ष के नेता के चयन को लेकर गंभीर नहीं है। पिछले दिनों नई दिल्ली में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब कांग्रेस के प्रमुख रणनीतिकार राहुल गांधी से हरियाणा में विपक्ष के नेता का चयन नहीं कर पाने की वजह जानी गई तो सीधा जवाब देने की बजाय राहुल गांधी उखड़ गये और सवाल का जवाब दिये बिना चले गये।
विपक्ष के नेता के बिना चला विधानसभा
कई साल के बाद यह पहला मौका है, जब हरियाणा विधानसभा का शीतकालीन सत्र बिना विपक्ष के नेता के चला है। कांग्रेस की दलील है कि कर्नाटक में भी भाजपा कई माह तक विपक्ष के नेता का चयन नहीं कर पाई थी।
कर्नाटक और हरियाणा दोनों राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां भिन्न हैं। कर्नाटक में विपक्ष के नेता का चयन देरी से होने के पीछे भाजपा की गुटबाजी वजह नहीं थी, लेकिन हरियाणा में कांग्रेस की गुटबाजी विपक्ष के नेता के चयन में देरी की सबसे बड़ी वजह है।
हुड्डा और सैलजा मिलकर लड़ते तो...
कांग्रेस हाईकमान के पास इस तरह की रिपोर्ट है कि यदि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कांग्रेस सांसद कुमारी सैलजा मिलकर चुनाव लड़ते तो पार्टी की सत्ता में वापसी हो सकती थी, लेकिन हुड्डा बहुत अधिक आत्मविश्वास में थे। उन्हें लग रहा था कि हर हाल में कांग्रेस की सरकार आने वाली है।
उनके शुभचिंतक जब हुड्डा के राजदुलारे दीपेंद्र हुड्डा को आकर अलग-अलग सीटों पर जीत में आने वाली बाधाएं दूर करने का सुझाव देते थे तो उन्हें जवाब मिलता था कि हमारी सरकार आ रही है, इसलिए एक-दो सीट हार भी गये तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। यह कहते-कहते कांग्रेस सत्ता से पूरी तरह दूर हो गई।
यदि एक-एक सीट पर आ रही बाधाओं को समय रहते दूर कर लिया जाता और सैलजा को भरोसे में लेकर चला जाता तो निसंदेह भाजपा के लिए तीसरी बार सत्ता में आना बड़ी चुनौती बन जाती, मगर विश्लेषक तो यहां तक कह रहे हैं कि कांग्रेस के गुटबाज नेताओं ने हरियाणा में तीसरी बार जीत भाजपा को थाली में परोसकर स्वयं प्रदान की है।
जीत से बेहद उत्साहित है भाजपा
भाजपा अपनी जीत से बेहद उत्साहित है और पार्टी की सदस्यता नवीनीकरण के साथ नये-नये लोगों को संगठन के साथ जोड़ने के अभियान में पूरी ताकत के साथ लगी है।
विधानसभा चुनाव में 67 प्रतिशत मतदान के बाद 55 लाख 48 हजार 800 वोट प्राप्त करने वाली भाजपा ने इस बार 50 लाख सदस्य बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। भाजपा हर छह साल बाद सदस्यता का नवीनीकरण करती है।
इस चुनाव में भाजपा को मिले हैं 39.94% वोट
हरियाणा की 90 सदस्यीय 15वीं विधानसभा में इस बार भाजपा को 48 सीटों के साथ 39.94 प्रतिशत वोट मिले हैं। कांग्रेस को 37 सीटों के साथ 54 लाख 30 हजार 602 यानी 39.09 प्रतिशत वोट मिले हैं। दोनों के मत प्रतिशत में मात्र 0.85 प्रतिशत का अंतर है।
भाजपा ने कांग्रेस के मुकाबले 11 सीटें अधिक हासिल की और मत प्रतिशत में बढ़ोतरी मात्र 0.85 प्रतिशत ही कर पाई। कांग्रेस के पास खुश होने का कारण यही बता है कि उसका और भाजपा का मत प्रतिशत लगभग बराबर है, लेकिन लोकतंत्र में हार-जीत काफी मायने रखती है।
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गुटबाजी छिपाने के लिए EVM को दोष दे रही है कांग्रेस
गुटबाजी को छिपाने के लिए कांग्रेस इस समय ईवीएम पर पूरे योजनाबद्ध तरीके से ठीकरा फोड़ने की रणनीति पर चल रही है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के समधि करण सिंह दलाल के नेतृत्व में एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाने की औपचारिकता निभाई गई।
इस कमेटी ने राज्य के हारे हुए सभी कांग्रेस प्रत्याशियों से फीडबैक लिया और उसके आधार पर जब चुनाव आयोग में कोई सुनवाई नहीं हुई तो हाई कोर्ट में दस्तक दी। हाई कोर्ट ने कांग्रेस की ईवीएम में गड़बड़ी होने संबंधी याचिकाको सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है, लेकिन इस पर सुनवाई कब शुरू होती है और कब निर्णय आता है, यह अभी भविष्य के गर्भ में छिपा है।
दीपक बाबरिया भी हार के एक कारण
कांग्रेस के रणनीतिकारों ने अपनी हार के कारणों में एक कारण पार्टी प्रभारी दीपक बाबरिया को भी बना रखा है। पार्टी की हार की नैतिक जिम्मेदारी लेने से बच रहे प्रदेश अध्यक्ष चौधरी उदयभान ने पिछले दिनों मीडिया में सार्वजनिक किया कि दीपक बाबरिया को मतगणना से पहले ही इस बात की जानकारी थी कि कांग्रेस किन-किन 14 विधानसभा सीटों पर चुनाव हारने वाली है।
उन्होंने कहा कि बाबरिया ने इस जानकारी को कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से साझा करने की बजाय छिपाने का काम किया। कांग्रेस के दिल्ली दरबार में बैठे नेता हुड्डा खेमे की इस रणनीति को भलीभांति समझ रहे हैं कि उदयभान को बचाने के लिए बाबरिया को बलि का बकरा बनाया जा रहा है। यही वजह है कि कांग्रेस हाईकमान इस बार विपक्ष के नेता का पद हुड्डा को देने के हक में नहीं है।
नेता प्रतिपक्ष के लिए इन विधायकों का नाम चर्चा में
कांग्रेस के नव निर्वाचित 37 विधायकों में 33 हुड्डा समर्थक हैं, लेकिन कांग्रेस हाईकमान की रुचि इस बात में हैं कि किसी दूसरे विधायक को यह जिम्मेदारी दी जानी चाहिये। इसके लिए आफताब अहमद, अशोक अरोड़ा, गीता भुक्कल, चंद्रमोहन बिश्नोई और डॉ. रघुबीर कादियान के नाम चर्चा में चल रहे हैं।
रही सही कसर सिरसा के कांग्रेस विधायक गोकुल सेतिया ने पूरी कर दी, जिन्होंने सीएम नायब सैनी के मंच पर जाकर उनकी तारीफ में पूल बांधे कि हुड्डा भी शर्मा गये। कांग्रेसियों को हाईकमान के फैसले का इंतजार है कि कब और किसे विपक्ष का नेता नामित किया जाता है।
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