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    हरियाणा चुनाव कांग्रेस-भाजपा के लिए अग्निपरीक्षा, सत्ता के लिए चल रहा द्वंद्व; हाशिये पर टिके क्षेत्रीय दल

    Updated: Tue, 20 Aug 2024 05:21 PM (IST)

    हरियाणा में विधानसभा चुनाव की (Haryana Assembly Election 2024) तैयारियां जोरों पर हैं। इस बीच कांग्रेस और भाजपा के बीच यह चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। लोकसभा चुनाव से स्पष्ट हो गया है कि दोनों ही पार्टियों को प्रदेश में बराबर का सपोर्ट है। वहीं मौजूदा समय में स्थानीय पार्टियों के लिए भी इस चुनाव में अपनी साख बरकरार रखना एक बड़ी चुनौती होगी।

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    हरियाणा विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के बीच कड़ी टक्कर

    सुधीर तंवर, चंडीगढ़। विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। प्रदेश में लंबे समय तक सत्ता की धुरी रहे क्षेत्रीय दल हाशिये पर हैं। भाजपा और कांग्रेस में सीधी टक्कर है। लोकसभा चुनाव में फिफ्टी-फिफ्टी सीटों पर कब्जा जमाने वाली दोनों पार्टियों के लिए विधानसभा चुनाव अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

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    भाजपा इस बार हैट-ट्रिक लगाने की पुरजोर कोशिश में है। मजबूत संगठन और केंद्र-प्रदेश की डबल इंजन की सरकार में हुए कामों के सहारे चुनावी रण में उतरी भाजपा का मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने का दांव सत्ता विरोधी लहर को रोकने में कारगर होता दिख रहा है।

    कांग्रेस में गुटबाजी पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं

    दूसरी तरफ, बगैर संगठन के लगातार तीसरा विधानसभा चुनाव लड़ रही कांग्रेस के लिए दिग्गजों की गुटबाजी कोढ़ में खाज का काम कर सकती है।

    सत्ता विरोधी लहर की आस लगाए बैठी कांग्रेस की नजर आंदोलनरत किसानों और कर्मचारियों सहित मौजूदा सरकार से नाखुश लोगों को एकजुट कर चुनावी लाभ लेने पर है। लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के प्रदर्शन को देखते हुए त्रिशंकु विधानसभा की संभावना से भी इन्कार नहीं किया जा सकता।

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    किंग मेकर रही जजपा में बिखराव 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बाद जजपा ने किंग मेकर की भूमिका निभाई थी।

    तब विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह मुख्य विपक्षी दल इनेलो दोफाड़ हुआ, उसी तर्ज पर इनेलो से निकली जजपा में आज बिखराव की स्थिति है। 10 में से छह विधायक जजपा का साथ छोड़ चुके हैं। इसी तरह आम आदमी पार्टी और इनेलो के लिए राह आसान नहीं।

    चौटाला को बैसाखी बनाने वाली भाजपा अब सबसे ताकतवर

    1966 में पंजाब से अलग होकर हरियाणा में शुरुआती वर्षों में कांग्रेस ही छाई रही, जबकि कुछ समय क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व रहा।

    वर्ष 1996 से भाजपा लगातार आगे बढ़ रही है, जब उसने चौधरी बंसीलाल की हरियाणा विकास पार्टी का समर्थन करते हुए सरकार बनाई। फिर 2000 में पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल से हाथ मिलाते हुए सत्ता में आई।

    इसके बाद भूपेंद्र सिंह हुड्डा के दो कार्यकाल के बाद साल 2014 में मोदी लहर में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और मनोहर लाल मुख्यमंत्री बने। 2009 में चार विधानसभा सीट जीतने वाली भाजपा 2014 में 47 सीटों पर पहुंच गई, जबकि कांग्रेस 47 सीटों से घटकर 15 पर आ गई। इनेलो भी 31 से घटकर 19 सीटों पर आ पहुंची थी, जिसके अब एक ही विधायक है।

    विधानसभा सीटों पर आप ने बनाई थी बढ़त

    आप का खाता खुलना हैरानी से कम न होगा संसदीय चुनाव में भाजपा ने 90 विधानसभा सीटों में से 44 पर बढ़त बनाई, जबकि कांग्रेस 42 सीटों पर आगे रही। आइएनडीआइए के तहत चुनाव लड़ रही आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस की मदद से चार विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाई, लेकिन अब अकेले विधानसभा चुनाव लड़ रही आप के लिए खाता खोलना किसी हैरानी से कम नहीं होगा।

    2019 में नहीं मिला भाजपा को बहुमत

    2019 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की पकड़ 2014 के मुकाबले कमजोर हुई है। 2005 से लेकर 2014 तक भूपेंद्र हुड्डा ने कांग्रेस सरकार चलाई और फिर अक्टूबर 2014 में भाजपा सत्तारूढ़ हो गई। 2019 में बहुमत नहीं मिलने पर भाजपा को सरकार बनाने के लिए निर्दलीयों के साथ जननायक जनता पार्टी का सहारा लेना पड़ा।

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