Haryana News: पंडित नेकीराम शर्मा हवेली में गांधी जी ने बनाई थी आंदोलन की रणनीति, 17 साल से संग्रहालय बनने का इंतजार; कहां सोया प्रशासन?
भिवानी में स्वतंत्रता सेनानी पंडित नेकीराम शर्मा की ऐतिहासिक हवेली 17 साल से संग्रहालय बनने का इंतजार कर रही है। महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी जैसे ...और पढ़ें

स्वतंत्रता सेनानी की हवेली को 17 साल से संग्रहालय बनने का है इंतजार (फोटो: जागरण)
सुरेश मेहरा, भिवानी। स्वतंत्रता सेनानी पंडित नेकीराम शर्मा की हवेली भारत की आजादी के आंदोलन के इतिहास काे समेटे है। भिवानी शहर के दिनोद गेट के समीप बनी इस हवेली में महात्मा गांधी, कस्तूरबा गांधी जैसे अनेक आजादी के आंदोलन के अग्रणी नेता आए और आंदोलन की रणनीति यहां पर बनी। वर्ष 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने इस हवेली को संग्रहालय बनाने की घोषणा की थी। उस समय इसकी मरम्मत पर 67 लाख रुपये भी खर्च किए थे। 17 साल बाद भी इस हवेली को संग्रहालय बनने का इंतजार है।
इस हवेली में पंडितजी के जीवन से जुड़ी चीजें यहां रखी जानी थी। फिलहाल पंडितजी का चश्मा, छड़ी, पत्र और किताबें दिल्ली के नेहरू म्यूजियम लाइब्रेरी में रखे हैं। कुछ चीजें जैसे चरखा, चारपाई और कुर्सी स्थानीय प्रशासन के पास हैं। संग्रहालय के रूप में बनाई उनकी हवेली आज भी पंडितजी से जुड़ी यादों का इंतजार कर रही हैं। सरकार इस हवेली की सुध लेती है तो दिल्ली के राजघाट की तर्ज पर यह हवेली भिवानी का राजघाट बन सकती है।
आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी के अलावा दूसरे बड़े नेताओं का खूब आना-जाना रहा। 22-24 अक्टूबर 1920 को भिवानी में पंडित नेकीराम शर्मा की ओर से अंबाला डिविजनल पालिटिकल कान्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इसमें महात्मा गांधी पहुंचे थे। इसमें कुर्सी रहित पांडाल लगाया था। इससे गांधीजी इतने प्रभावित हुए थे कि बाद में देशभर में कांग्रेस के जितने अधिवेशन हुए सब कुर्सी रहित हुए और यह परंपरा बन गई थी।
25 मई 2007 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम आजाद भी स्वतंत्रता सेनानी पंडित नेकीराम शर्मा को श्रद्धांजलि देने के लिए उनके पैतृक गांव केलंगा पहुंचे थे। राष्ट्रपति डा.कलाम ने नेकीराम शर्मा को महान देशभक्त बताया था। उनके पैतृक गांव केलंगा को आदर्श गांव भी घोषित किया है। पूर्व विधायक डा. शिवशंकर भारद्वाज के प्रयासों से भिवानी के दिनोद गेट स्थित उनके आवास को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया था।
पंडित नेकीराम शर्मा की हवेली संग्रहालय बनने के लिए तैयार है। वर्ष 2008 में इसको मंजूरी मिल गई थी मरम्मत भी कराई गई पर आज तक संग्रहालय नहीं बनाया गया है। मुख्यमंत्री मुझसे कोई जानकारी चाहते हैं और इस हवेली को संग्रहालय बनाते हैं तो मैं उनके आमंत्रण पर जाने के लिए तैयार हूं। पंडितजी और आजादी के आंदोलन के इतिहास को सहेजना सरकार की जिम्मेदारी बनती है।
डॉ. शिवशंकर भारद्वाज, पूर्व विधायक।
मेरे परदादा स्वतंत्रता सेनानी पंडित नेकीराम शर्मा की हवेली काे संग्रहालय बनाने की घोषणा तो हुई थी पर आज तक बनाया नहीं गया है। सरकारों के रवैये से वह और उनका परिवार आहत है। वर्तमान सरकार में जिला अध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष, पुरातत्व विभाग सबको लिख चुके हैं। सरकार पंडितजी को सम्मान दे।
पराग शर्मा, परपौत्र, दिवंगत पंडित नेकीराम शर्मा।
पंडित नेकीराम शर्मा का जन्म 7 सितंबर 1887 को भिवानी जिले के केलंगा गांव में पंडित हरीप्रसाद मिश्र के घर हुआ था। उन्होंने उत्तर प्रदेश के सीतापुर, बनारस व अयोधा रहकर संस्कृत में उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्हें दिसंबर 1905 में इंडियन नेशनल कांग्रेस के सालाना अधिवेशन बनारस के मौके पर देश के श्रेष्ठ नेताओं गोपाल कृष्ण गोखले, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, पंजाब केसरी लाला लाजपतराय, बाबू सुरेंद्र नाथ बैनर्जी व महामना पंडित मदन मोहन मालवीय से मिलने का मौका मिला और उनके भाषणों से प्रेरणा मिली।
उनके प्रपोत्र पराग शर्मा ने बताया कि स्वतंत्रता सेनानी एवं हरियाणा केसरी पंडित नेकीराम शर्मा ने अंग्रेज डीसी के 25 मुरब्बे जमीन देने के प्रलोभन को न केवल ठुकरा दिया, बल्कि यह भी कहा कि ये पूरा देश ही मेरा है, अंग्रेजों तुम मुझे क्या जमीन दोगे। वे 1907 में 20 वर्ष की आयु में वापस अपने गांव केंलगा लौट आए।
अंग्रेज सरकार ने वर्ष 1907 में भगत सिंह, चाचा सरदार अजीत सिंह, लाला लाजपत राय को मांडले जेल भेजना और 1908 में लोकमान्य तिलक पर अभियोग चलाना नेकीराम को सहन नहीं हुआ और वे अंग्रेजी सरकार के घोर विरोधी बन गए। जब लोकमान्य तिलक को छह वर्ष कठोर कारावास की सजा सुनाई तो पंडित नेकीराम ने एक दिन का उपवास रखा तथा यह प्रतिज्ञा की कि जब तक अंग्रेजी राज समाप्त नहीं हो जाता, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे।
पंडित नेकीराम हिंसात्मक तरीके से लड़ना चाह रहे थे, परंतु इस काम के लिए कलकता पहुंचे तो उनकी मुलाकात कांग्रेस के प्रमुख नेता बाबू सुरेंद्र नाथ बनर्जी से हो गई। उन्होंने पंडितजी को अहिंसा का पाठ पढ़ाया। महात्मा गांधी से उनकी पहली मुलाकात 1915 में मुम्बई कांग्रेस के दौरान हुई। वे गांधीजी की प्रेरणा से अस्पृश्यता के विरुद्ध अभियान में शामिल हो गए।
होम रूल आंदोलन में कार्य करते हुए नेकीराम की पहली मुलाकात मार्च 1918 में उत्तर प्रदेश में इटावा नामक स्थान पर पंडित जवाहर लाल नेहरू से हुई। यह मुलाकात बाद में मजबूत दोस्ती में बदल गई। 30 जून 1918 को होम रूल आंदोलन में उन्हें एक अन्य नेता आसफ अली के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। असहयोग आंदोलन को लोकप्रिय बनाने के लिए 22 अक्टूबर 1920 को अंबाला डिवीजनल पालिटिकल कांफ्रेस भिवानी में बुलाई गई।
उसमें पंडित नेकीराम के आग्रह पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, शोकत अली, मोहम्मद अली, मोलाना अबुल कलाम आजाद एवं कस्तूरबा गांधी शामिल हुए। उस समय इस कांफ्रेंस में 60 हजार लोगों की हाजिरी थी, जिसमें 50 हजार किसान थे। पंडित नेकीराम शर्मा रौलेट एक्ट विरोधी आंदोलन 1919, असहयोग आंदोलन 1920-22, नमक सत्याग्रह 1930-34, व्यक्तिगत सत्याग्रह 1940-41 एवं भारत छोड़ा आंदोलन 1942-44 में अग्रणी भूमिका में रहे और 2200 दिन जेल में रहे। 8 जून 1956 को उनका निधन हो गया था।

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