मुंबई (अजय ब्रह्मात्मज)।

प्रमुख कलाकार: हिमांश कोहली, रकुल प्रीत सिंह, दीप्ति नवल और गुलशन ग्रोवर।

निर्देशक: दिव्या खोसला कुमार।

संगीतकार: प्रीतम, हनी सिंह, मिथुन, अनुपम अमोद और अरको प्रवो मुखर्जी।

स्टार: 1.5

कैंपस लाइफ और यूथ इधर की कई फिल्मों के विषय रहे हैं। सभी फिल्मकारों की एक ही कोशिश दिखाई पड़ती है। वे सभी यूथ को तर्क और व्यवहार से सही रास्ते पर लाने के बजाय कोई इमोशनल झटका देते हैं। इस इमोशनल झटके के बाद उनके अंदर फिल्मों से तय किए गए भारतीय सामाजिक और पारिवारिक मूल्य जागते हैं। कभी प्रेम तो कभी स्कूल, कभी कैंपस तो कभी देश, कभी महबूबा तो कभी परिवार ़ ़ ़ इन सभी के लिए वे जान की बाजी लगा देते हैं। स्टूडेंट लाइफ के मूल काम पढ़ाई से उनका वास्ता नहीं रहता। पढ़ाई के लिए कोई प्रतियोगिता नहीं होती।

पढ़ें, यारियां फिल्म की हीरोइन रकुल प्रीत का इंटरव्यू

दिव्या खोसला कुमार ने पहली फिल्म के लिए ऐसे पांच यूथ को चुना है। ऑस्ट्रेलिया के एक बिजनेसमैन से स्कूल को बचाने के लिए जरूरी हो गया है कि उस स्कूल के बच्चे ऑस्ट्रेलिया की टीम के मुकाबले में उतरें। पांच किस्म की प्रतियोगिताओं में जीत के बाद वे अपने स्कूल को बचा सकते हैं। यह मत सोचें कि क्या कहीं कोई ऐसी स्पर्धा होती है, जहां एक स्कूल के छात्रों का मुकाबला किसी देश से हो। यह फिल्म है।

फिल्म के आरंभ में सभी को बिगड़ा और भटका हुआ दिखाया गया है। पढ़ाकू मिजाज की लड़की उनके लिए 'बहन जी' टाइप है। इन फूहड़ फिल्मों में पढ़ाई-लिखाई और मूल्यों का भद्दा मजाक उड़ाया जाता है। लापरवाही, उदंडता, उच्छृंखलता को 'कूल' माना जाता है। 'यारियां' के यूथ ऐसे ही 'कूल' हैं। चूंकि फिल्म भारतीय दर्शकों के लिए है, इसलिए मां-बाप, नैतिकता, स्कूल की प्रतिष्ठा आदि के प्रसंग जोड़ दिए गए हैं। 'यारियां' हिंदी फिल्मों के घिसे-पिटे फॉर्मूले का घटिया अनुकरण है। इस फिल्म को देखते हुए अगर कुछ चर्चित यूथ फिल्में याद आएं तो उसे प्रेरणा मान कर दिव्या खोसला कुमार की पहली निर्देशकीय कोशिश का संज्ञान लें।

फिल्म का गीत-संगीत आज के दौर का है। गीतों और प्रतियोगिता के दृश्यों के फिल्मांकन में निर्माता ने असीमित खर्च किया है। 'यारियां' की मूलकथा लचर और ढीली है, लेकिन उसकी सजावट और पैकेजिंग आकर्षक एवं भव्य है। फिल्म में पैसे खर्च होते हुए दिखते हैं। कमी है तो सिर्फ पैशन की।

फिल्म के सारे कलाकार नए हैं। उनमें जोश और एनर्जी है। वे मिले हुए किरदारों को ईमानदारी से निभाते हैं। मेहनत भी करते हैं, लेकिन उस मेहनत का कोई नतीजा नहीं निकलता। करें भी तो क्या, आखिर उनके किरदार आधे-अधूरे और कंफ्यूज तरीके से रचे गए हैं।

अवधि-145 मिनट

मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर