नई दिल्ली, मनोज वशिष्ठ। एमएक्स प्लेयर पर एक वेब सीरीज आयी थी- भौकाल। इसकी कहानी उत्तर प्रदेश के दबंग माने-जाने वाले पुलिस अफसर नवनीत सिकेरा के किस्सों पर आधारित थी। नवनीत सिकेरा का किरदार टीवी के चर्चित चेहरे मोहित रैना ने निभाया था।

अब नेटफ्लिक्स बिहार कैडर के आइपीएस अफसर अमित लोढा के एडवेंचरों की कहानी लेकर आया, जो उनकी किताब बिहार डायरीज में दर्ज हैं। इस सीरीज में अमित लोढा के किरदार में टीवी के चर्चित अभिनेता करण टैकर हैं। बेबी, स्पेशल 26 जैसी फिल्मों और स्पेशल ऑप्स सीरीज के निर्देशक नीरज पांडे खाकी के लेखक-निर्माता हैं। सीरीज का निर्देशन भव धूलिया ने किया है।

खाकी की कहानी इस किताब में लिखी गयी घटनाओं का स्क्रीन रूपांतरण है। बिहार पुलिस, राज्य की सियासत, जातिगत समीकरण और भेदभाव से निकले बाहुबलियों के बीच गठजोड़ और तकरार का रोमांचक खाका खींचा गया है। घटनाएं असली हैं, मगर कुछ नामों और जगहों को बदला गया है।

नीरज ने खाकी के लिए जो विषय चुना है, वो नया नहीं है। 'पुलिस बनाम गैंगस्टर' कहानियों पर अनगिनत फिल्में और वेब सीरीज बन चुकी हैं। ज्यादातर कहानियों के पात्र और घटनाक्रम लगभग एक जैसे ही रहते हैं, अगर कुछ अलग करता है तो वो है, कहानी को कहने और दिखाने का अंदाज। खाकी कुछ नया तो नहीं देती, पर निराश भी नहीं करती। औसतन, एक घंटे की अवधि वाले सात एपिसोड्स में इस सीरीज की कहानी फैली हुई है। 

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स्टोरी- अमित लोढा बनाम चंदन महतो

जयपुर के आइपीएस अफसर अमित लोढा को बिहार कैडर मिलता है। सदी की शुरुआत है और बिहार में जंगलराज है। अपराधियों का इस कदर बोलबाला है कि राजधानी पटना में भी अपहरण की वारदातें होती रहती हैं। अगड़े-पिछड़ों, अमीर-गरीब के बीच की खाई से निकला चंदन महतो अपराध की दुनिया में बड़ा नाम कमाना चाहता है। फिर चाहे इसके लिए 25 लोगों का सरेआम नरसंहार ही करना हो।

महतो के पास उसकी जाति के लोगों का साथ और पीठ पर सत्तासीनों का हाथ है। मगर, उसकी दिन-ब-दिन बढ़ती हिमाकत जब उसके हिमायतियों के लिए ही खतरा बन जाती है तो उसके बुरे दिन शुरू होते हैं और आइपीएस अमित लोढा उसे पकड़ने के मिशन में जुट जाता है। वादे के मुताबिक एसपी लोढा उसे 15 अगस्त से पहले पकड़ लेता है और कुछ नाटकीय घटनाक्रमों के बाद अदालत महतो को कत्ले-आम के लिए सजा-ए-मौत सुनाती है। 

कसा स्क्रीनप्ले, सधे डायलॉग

नीरज पांडे ने अमित लोढा की किताब के चैप्टरों को कसी हुई पटकथा में तब्दील किया है। कहानी इंस्पेक्टर रंजन कुमार (अभिमन्यु सिंह) के नैरेशन से शुरू होती है। पहले दृश्य में दिखाया गया है कि बिहार में चुनाव के नतीजे आने वाले हैं। उधर, रंजन कुमार ने कुख्यात गैंगस्टर चंदन महतो के घर के बाहर घेराबंदी की हुई है और फोन पर अपने सीनियरों से निर्देश ले रहा है।

चुनाव में जीतने-हारने की संभावनाओं के साथ किस तरह चंदन को पकड़ने की योजना बनती-बिगड़ती है, यह दृश्य खाकी- द बिहार चैप्टर के सात एपिसोड्स की दिलचस्प बुनियाद रख देता है, जो आगे जाकर कहानी से जुड़ता है। खाकी की कहानी रंजन कुमार के नैरेशन के जरिए आगे बढ़ती रहती है और केंद्र में रहता है- आइपीएस अमित लोढा। 

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खाकी का असली रोमांच चौथे एपिसोड से शुरू होता है, जब लोढा और महतो के बीच माइंड गेम शुरू होता है। नई सदी की शुरुआत में मोबाइल फोन जरूरत से ज्यादा स्टेटस सिम्बल बन चुके थे, उस दौर में खतरनाक चंदन महतो को पकड़ने के लिए आइआइटी दिल्ली में पढ़े आइपीएस अफसर अमित ने जिस तरह मोबाइल सर्विलांस की मदद ली थी, वो सीरीज का सबसे दिलचस्प हिस्सा है।

आज यह सब साधारण सी बात लग सकती है, क्योंकि आपराधिक मामलों में मोबाइल सर्विलांस अब सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है, मगर जिस समय इस तकनीक के बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं थी, उस वक्त बिहार पुलिस के एक अफसर द्वारा पैरेलल लिस्निंग का इस्तेमाल करना रोमांच जगाता है। नीरज ने इन दृश्यों को गढ़ने में अपना हुनर दिखाया है।

दरअसल, उनकी जीत इसी में है कि दर्जनों दफा कही जा चुकी कहानी को इस तरह से पेश किया है कि आप बोर नहीं होते। मुख्य कहानी के साथ बीच-बीच में पुलिस अधिकारियों के हालात पर भी सीरीज टिप्पणी करते हुए चलती है। हालांकि, इसको लेकर नीरज गहराई में नहीं उतरे। खाकी में कलाकारों का अभिनय, उनका चित्रण और कथानक पकड़कर रखता है। स्टोरी और स्क्रीनप्ले की तरह खाकी के संवाद भी बेहद सहज और स्थानीयता का पुट लिये हुए हैं।

बिहार पहुंचने पर अमित लोढा को 'मैं' की जगह 'हम' बोलने की नसीहत इसकी बानगी है। यहां तक कि सीरीज के विलेन चंदन महतो के हिस्से में भी असरदार संवाद आये हैं। गैंगस्टर ड्रामा होने के बावजूद सीरीज में गालीगलौज का प्रयोग ना के बराबर है। आम तौर पर इस तरह की सीरीज A श्रेणी में जारी की जाती हैं, पर नेटफ्लिक्स ने खाकी को U/A 13+ कैटेगरी में जारी किया है। 

किरदारों के दायरे में अभिनय

सीरीज की सबसे बड़ी कमी इसके दोनों मुख्य किरदारों में विस्तार की कमी है। कुछ दृश्यों के जरिए अमित लोढा की पृष्ठभूमि दिखायी गयी है, मगर जिस स्तर का वो सुपर कॉप वाला किरदार है, उसमें वो नाकाफी लगता है। करण ने इस किरदार में जान डालने की पूरी कोशिश की है, मगर इसे निभाने के लिए जिस तरह का एंगर चेहरे पर दिखना चाहिए, वो मिसिंग लगता है। शायद ऐसा करने की पीछे वजह कथ्य को वास्तविकता के करीब रखने की कोशिश हो।

चंदन महतो के किरदार में अविनाश तिवारी ने सचमुच गजब काम किया है। नीरज ने उनके किरदार को गढ़ने और तराशने में मेहनत की है। गंदे दांत, बिखरे बाल और गंदे कपड़ों में पूरी सीरीज में दिखे अविनाश ने चंदन महतो की क्रूरता को नफरत करने की हद तक जिया है।

चंदन के विश्वासपात्र च्यवनप्राश साहू के रोल में जतिन सरना ने बराबर का साथ दिया। प्रेमिका के साथ आधी रात को अतरंगी बातें करने वाला च्यवनप्राश इस कहानी के सबसे अहम पात्रों में से एक है। च्यवनप्राश की पत्नी मीता देवी के किरदार में ऐश्वर्या सुष्मिता प्रभावित करती हैं। उन्हें परतदार किरदार मिला है, जिसका फायदा भी उठाया। ऐश्वर्या स्पेशल ऑप्स में भी नजर आ चुकी हैं। मीता का किरदार सीरीज के अंतिम हिस्से में जबरदस्त ट्विस्ट लेकर आता है।

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अमित लोढा की पत्नी तनु के रोल में निकिता दत्ता ठीक लगी हैं। हालांकि, उनके हिस्से ऐसे सीन कम ही आये, जिनमें वो अपनी अदाकारी का अलग आयाम दिखा पाएं। रवि किशन का किरदार कहानी के लिए अहम है, मगर ज्यादा लम्बा नहीं है। हवा का रुख देखकर रंग बदलने वाले आइपीएस के किरदार में आशुतोष राणा मनोरंजक होने के साथ गहरे भी दिखते हैं। विनय पाठक और श्रद्धा दास की मौजूदगी मेहमान भूमिका की तरह रही है। भव धूलिया का निर्देशन चुस्त है। उस पर नीरज की छाप स्पष्ट नजर आती है। कलाकारों से उनकी क्षमता और विशेषता के हिसाब से काम निकलवाया गया है। सहयोगी किरदार निभाने वाले कलाकार भी प्रभाव छोड़ते हैं।

कलाकार- करण टैकर, अविनाश तिवारी, जतिन सरना, अभिमन्यु सिंह, निकिता दत्ता, ऐश्वर्या सुष्मिता, आशुतोष राणा, रवि किशन, अनूप सोनी आदि।

निर्देशक- भव धूलिया

निर्माता- नीरज पांडे

प्लेटफॉर्म- नेटफ्लिक्स

स्टार- *** (तीन)

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Edited By: Manoj Vashisth

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