नई दिल्‍ली। थोड़ी सी हिम्मत चाहिए मन का काम करने के लिए। जब आप अपने दिल का काम करेंगे तो लगेगा ही नहीं कि काम कर रहे हैं। मैं इन्हीं पलों को जी रहा हूं, सपने पूरे कर रहा हूं। ज्यादा मेहनत नहीं करता, स्मार्ट वर्क में विश्वास रखता हूं। कहते हैं सुशांत सिंह राजपूत। बॉलीवुड में पैर जमा चुके सुशांत हाल में एंटरप्रेन्योर के तौर पर नीति आयोग से भी जुड़े हैं। तकनीक से भविष्य में होने वाले खतरों की तैयारी अभी ही कर लेने पर जोर देते हैं वे। उनसे यशा माथुर की बातचीत के मुख्य अंश...।

स्मार्ट काम करने की जरूरत
आज बहुत ज्यादा मेहनत करने की नहीं, बल्कि स्मार्ट काम करने की जरूरत है। अगर आप बहुत मेहनत करके सफल होते हैं तो मेहनत करने की आपकी स्किल अच्छी हो जाएगी और फिर आपको उसी के लिए काम पर लिया जाएगा। फिर आप जिंदगी भर मेहनत ही करते रहेंगे। मैं साइंस में रुचि नहीं रखता था, फिर भी मैंने राष्ट्रीय स्तर का इंजीनियरिंग टेस्‍ट पास किया। तभी मुझे लगा कि अगर यह कर सकता हूं तो वह काम क्यों न करूं जिसमें मुझे मजा आता है। उसमें तो ज्यादा अच्छा कर सकता हूं। आप अपनी पसंद का काम करें और उसे ही करते रहें तो आप बहुत अच्छे निकलेंगे। इससे आप पैसे भी कमाएंगे और शोहरत भी मिलेगी। मुझे एक्टिंग अच्छी लगती है। इससे मुझे शोहरत और पैसे मिलते हैं। लगता ही नहीं कि मैं मेहनत कर रहा हूं।

चाहिए थोड़ी सी हिम्मत
बचपन में मुझे शाम चार से साढ़े पांच बजे तक क्रिकेट खेलने के लिए कहा जाता था। मैं उसमें बहुत एंजॉय करता था, जबकि मुझे पता था कि मुझे आइआइटी की परीक्षा देनी है। मैं चार बजने का इंतजार करता लेकिन वह बहुत देर से बजते और जब खेलने लगता तो ऐसा लगता कि पांच मिनट में ही डेढ़ घंटे खत्म हो गए। मैं पिछले बारह साल से वही चार से साढ़े पांच बजे की जिंदगी जी रहा हूं। वह काम कर रहा हूं जो मुझे अच्छा लगता है। मैं खेलता हूं, वैल्यू एड करता हूं, कुछ क्रिएट करने की कोशिश करता हूं। अगर पैसा बीच में न हो तो थोड़ी सी हिम्मत करके अपनी  पसंद का वह काम किया जा सकता है जिसमें ज्यादा मेहनत न करनी पड़े।

मेरी खुशी में पैरेंट्स खुश

जब मैंने इंजीनिर्यंरग छोड़कर एक्टिंग फील्ड में जाने का फैसला घर पर सुनाया तो मेरे पैरेंट्स निशब्द थे। मैंने इसका फायदा उठाया और आगे बढ़ गया। अभी भी मेरे डैडी जब मुझे फोन करते हैं तो कहते हैं कि गुप्ता अंकल मिले थे वह तुम्हारी तारीफ कर रहे थे, और जब मैं थैंक्यू कहता हूं तो वे कहते हैं, यार डिग्री ले लेते तो अच्छा रहता। अब मेरी तैयारी जीत की है। उनके लिए कहीं न कहीं से डॉक्टरेट की डिग्री लेकर उन्हें देने वाला हूं। जब मैं अपने सपने पूरे करने जा रहा था तो उन्होंने काफी सपोर्ट किया। मैंने उनसे कहा कि इसमें बेशक पैसे कम मिलेंगे लेकिन मैं खुश रहूंगा और आप मेरी खुशी चाहते होंगे। उन्होंने मेरी बात को समझा।

सरकार से साझा की जिम्मेदारियां
मैं नीति आयोग से आदर्शों के स्तर पर जुड़ा हूं। मैंने और मेरे पार्टनर वरुण माथुर ने मिलकर पिछले दिनों एक कंपनी लॉन्च की है। इसका नाम इंसेई है। इसका अर्थ इंट्यूशन है। इसके तहत हम फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी और आने वाली तकनीकों के विपरीत प्रभाव पर काम करेंगे। मुझे नहीं पता था कि सरकार का थिंक टैंक पहले ही बहुत सारी चीजें कर रहा है और हमारे उद्देश्य सरकार के मकसद से काफी मिलते हैं। यह मेरे लिए सम्मान की बात है कि उन्होंने हमें पहचाना है। मुझे उनका संदेश लोगों तक पहुंचाना है और बताना है कि भविष्य में क्या, किस तरह से होने वाला है और उसका कैसा परिणाम मिलने वाला है। फिर लोग सोच सकेंगे कि हम देश के विकास में अपना योगदान कैसे दे सकते हैं। आज भारत का बहुत बेहतर समय है कि यह डिजिटलाइज हो रहा है। इससे विकास को रफ्तार मिलेगी।

तकनीक के विपरीत प्रभाव की तैयारी
दिल्ली के इंजीनिर्यंरग कॉलेज में पढ़ा हूं। तकनीक से दूर नहीं हूं। मैं जानता हूं कि कैसी नई तकनीकें आ रही हैं और उनका क्या प्रभाव होगा। यह प्रभाव सिर्फ आर्थिक ही नहीं सामाजिक भी होता है। अब देखिए अगर वर्चुअल रियलिटी आती है और आप अपना सारा काम इसी से करेंगे तो आपकी शारीरिक सक्रियता कम होती चली जाएगी। अभी हमारा शरीर हर दिन 12 मील चलने के लिए बना है। अगर हम वर्चुअल रियलिटी का प्रयोग करेंगे तो इतना भी नहीं चलेंगे। इससे सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अगर आज हम इस स्थिति को अच्छी तरह से देख पा रहे हैं तो क्यों नहीं आज ही बिहैवियरल इकोनॉमिस्ट्स के साथ बैठकर समाधान ढूंढ लें। इसकी तैयारी कर लें और लोगों को समाधान बताएं तो तरक्की कर सकते हैं।

ढूंढता हूं फेल होने के तरीके
मैं सफलता के लिए फेल होने के ज्यादा तरीके ढूंढता हूं। एक तरीके से बहुत बार फेल होना तो बेवकूफी है लेकिन मुझे बहुत मजा आता है यह ढूंढने में कि मैं कितने तरीके से गलत हो सकता हूं। अगर चार तरीके से फेल होता हूं तो पांचवां सही तरीका होगा। वह तरीका मेरा इनोवेशन है जिसे अपने व समाज की बेहतरी के लिए प्रयोग कर सकता हूं। इससे मेरी सफल होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। मैं बहुत कुछ सीखना और एक्सप्लोर करना चाहता था इसलिए एक्टर बना। अगर आप इंजीनिर्यंरग के तीसरे साल में पढ़ रहे हैं, आठ महीने में आपकी इंजीनिर्यंरग पूरी होने वाली हो और आप ड्रॉपआउट हो जाते हैं, हीरो बनने के लिए निकल जाते हैं तो यह बहुत बड़ी बेवकूफी है लेकिन अलग तरीके से हारने वाली इच्छा से मैं ऐसा कर पाया।

सारे किरदार एक बराबर
चाहे ब्योमकेश बक्शी करूं या एमएस धौनी, मेरे लिए दोनों ही रियल हीरो हैं। मेरे दिमाग में जरा भी शक नहीं है कि मैं ब्योमकेश नहीं हूं या धौनी नहीं हूं। अगर मुझे इसमें शक होगा तो आपको मजा नहीं आएगा। दरअसल रिस्पॉन्सिबिलिटी का एकनॉलेजमेंट और काम कितना मुश्किल है इनमें कोई संबंध नहीं है। हां, रिस्पॉन्सिबिलिटी का एकनॉलेजमेंट धौनी में ज्यादा है क्योंकि मुझे जिम्मेदारी दी गई थी कि एक सम्मानजनक इंसान का वैल्यू एडीशन करूं और लोगों को वह बताऊं जो उन्हें पता नहीं है। लेकिन कौन कठिन है कौन आसान, इससे यह तय नहीं होता। दोनों ही बराबर हैं मेरे लिए।

देश की पहली स्पेस फिल्म
इन दिनों धर्मा प्रोडक्शंस की ‘ड्राइव’, अभिषेक कपूर की फिल्म ‘केदारनाथ’, अभिषेक चौबे की फिल्म ‘सोन चिड़िया’, मुकेश छाबड़ा की ‘फॉल्ट इन अवर स्टार्स’, नितेश तिवारी की एक फिल्म में काम कर रहा हूं। एक फिल्म हम बना रहे हैं जो भारत की पहली स्पेस फिल्म होगी।

महिलाएं बनें एंटरप्रेन्योर
हमें चाहिए कि महिलाएं व्यवसायी बनें। यही आज की जरूरत है। महिलाएं चीजों को अर्थ देती हैं। वैल्यू एड करती हैं। यह बात मेरी जिंदगी से भी ताल्लुक रखती है। मेरी मां और चार बहनों ने ही मुझे सब कुछ सिखाया है। अगर वे एंटरप्रेन्योर हैं तो मैं उनका स्टार्टअप हूं। देखिए कितना कमाल का स्टार्टअप है उनका।

कमाल है योग
फिटनेस के लिए अच्छा खाता हूं, अच्छा सोता हूं, व्यायाम करता हूं, योग करत  हूं। यह योग का कमाल है कि मैं फिट हूं।

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Posted By: Kamal Verma