स्मिता श्रीवास्तव, मुंबई जेएनएन। वक्त के साथ कदमताल करते हुए हिंदी सिनेमा में अब वीएफएक्स का शानदार प्रदर्शन हो रहा है। निर्देशक तकनीक के बारे में ज्यादा जागरूक हैं। बालीवुड ने वीएफएक्स की कला में काफी महारत हासिल कर ली है। आधुनिक तकनीकों के साथ बन रही फिल्मों में भव्यता का स्तर ऊंचा हो चुका है। तकनीक के क्षेत्र में दर्शकों तक उम्दा मनोरंजन पहुंचाने को लेकर लगातार प्रयासरत भारतीय सिनेमा के स्वावलंबन को बताता स्मिता श्रीवास्तव का आलेख...

आर्देशिर ईरानी द्वारा निर्देशित भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ की रिलीज को भारतीय सिनेमाघरों में प्रयोगात्मक युग माना जाता है। इसके बाद वर्ष 1939 में ‘पुकार’ शानदार सेटों का उपयोग करने वाली और बतौर पटकथा लेखक कमाल अमरोही की पहली फिल्म थी। इसी वर्ष देबाकी बोस द्वारा निर्देशित फिल्म ‘अपराधी’ आई, यह पहली फिल्म थी जिसे आर्टिफिशियल लाइट का उपयोग करके शूट किया गया था।

रंगीन हो गया सिनेमा

भारत की पहली रंगीन फिल्म ‘किसान कन्या’ (1937) मानी जाती है। इसे मोती बी. गिडवानी ने बनाया था तो वहीं भारत में ट्रिक फोटोग्राफी के जनक और स्पेशल इफेक्ट निदेशक के रूप में मशहूर बाबूभाई मिस्त्री ने 1937 में रिलीज हुई फिल्म ‘ख्वाब की दुनिया’ के लिए स्क्रीन पर विशेष प्रभाव पैदा करने के लिए कुछ नवीन तकनीकों का प्रयोग किया। प्रोजेक्टर आने के बाद फिल्ममेकर्स ने अपनी पसंद के हिसाब से बैकग्राउंड में चीजें दर्शानी शुरू कीं। वर्ष 1950 से शुरू हुए युग को एक सुनहरे युग के रूप में माना जाता था। यह वह समय था जब भारतीय सिनेमाघरों में टेक्नीकलर की शुरुआत हुई थी। हालांकि टेक्नीकलर में बनने वाली पहली बालीवुड फिल्म का विषय बहस का है। कुछ का कहना है कि यह दिलीप कुमार अभिनीत ‘आन’ है, जबकि कुछ का मानना है कि सोहराब मोदी की पुरानी क्लासिक ‘झांसी की रानी’ पहली टेक्नीकलर फिल्म है, मगर इसमें कोई दो राय नहीं कि फिल्म कोई भी हो, मुद्दा तकनीक के विकास का है, जिसमें हम सफल होते रहे।

हर दिन बदल रही तकनीक

सिनेमा में तकनीक विकसित होने को लेकर सिनेमेटोग्राफर महेश लिमाए कहते हैं, ‘पहले हर फिल्म का स्टाक यानी निगेटिव आता था। अगर नाइट शूट है तो उसके लिए अलग प्रक्रिया, अलग लाइटिंग अपनानी पड़ती थी। जैसे-जैसे स्टाक अपडेट होते गए तो कम रोशनी में या कैंडल लाइट में भी शूट करना आसान हो गया। अब डिजिटल क्रांति आने से आप बिना लाइट के भी शूट कर सकते हैं। ‘दबंग’ स्टाक पर शूट हुई थी जबकि ‘दबंग 3’ डिजिटल कैमरा पर शूट हुई थी। अब हर महीने कोई नई तकनीक आ रही है। ऐसे में खुद को अपडेट रखना बहुत जरूरी है।’

प्रयोग करने का साहस

हिंदुस्तानी फिल्मों के विजुअल इफेक्ट्स को लेकर विजुअल इफेक्ट्स और एनिमेशन कंपनी डीएनईजी के चेयरमैन और सीईओ नमित मल्होत्रा कहते हैं, ‘हमारे देश में अब अच्छे मौके बन रहे हैं, कई प्रतिभाशाली लोग हैं, जिनमें हर कठिनाई से जीतने और प्रयोग करने का साहस है। अब मेकर्स वीएफएक्स की प्रक्रिया, उसमें आने वाले खर्च आदि को समझकर उसे फिल्मों का अहम हिस्सा बना रहे हैं। ‘आरआरआर’ और ‘ब्रह्मास्त्र’ जैसी फिल्में इसकी बानगी हैं। दो-चार साल में भारतीय सिनेमा में भी वीएफएक्स का स्तर और ऊंचा होगा। अब तकनीक इतनी उन्नत हो गई है कि कभी-कभी दर्शक यह तक नहीं समझ पाते हैं कि फिल्म में वीएफएक्स का इस्तेमाल किया जा रहा है।’ ‘कोई मिल गया, ‘कृष’, ‘जोधा अकबर’, ‘बाजीराव मस्तानी’, ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘पद्मावत’, ‘हाउसफुल 4’, ‘फैन’, ‘तान्हाजी: द अनसंग वारियर’, ‘टाइगर जिंदा है’ जैसी फिल्मों के साथ ‘बाहुबली’ फ्रेंचाइजी और ‘आरआरआर’ इसके कुछ प्रमुख उदाहरण हैं।

बदल गए आयाम

बहरहाल भारतीय सिनेमा में पहली थ्रीडी फिल्म साल 1984 में ‘छोटा चेतन’ आई थी। बाद में इस तकनीक से दर्जनों फिल्में बनाई गईं। ‘हांटेड 3डी’, ‘रा.वन’, एबीसीडी, एबीसीडी-2, ‘क्रिएचर थ्रीडी ’ जैसी कुछ ऐसी फिल्में हैं जिनमें थ्रीडी और फोरडी एडवांस तकनीक का प्रयोग किया गया। आगामी दिनों में किच्चा सुदीप अभिनीत ‘विक्रांत रोणा’, ‘ब्रह्मास्त्र’ भी थ्रीडी में रिलीज होगी। खास बात यह है कि ‘विक्रांत रोणा’ का ट्रेलर भी थ्रीडी में बना है। तकनीक की बढ़ती मांग को समझते हुए अभिनेता अजय देवगन तो अपनी वीएफएक्स कंपनी भी शुरू कर चुके हैं। उनकी हालिया रिलीज फिल्म ‘रनवे 34’ में भी वीएफएक्स का प्रयोग हुआ है।

वर्चुअल दुनिया ने खोले रास्ते

फिल्ममेकर विक्रम भट्ट की आगामी फिल्म ‘जुदा होके भी’ वर्चुअल वर्ल्ड में शूट होने वाली पहली हिंदी फिल्म है। विक्रम कहते हैं, ‘यह अपने आपमें पहली फिल्म है, जो दो कंप्यूटर के भीतर शूट की गई है। सारे लोकेशन असल में हैं ही नहीं, सब वर्चुअल हैं। एक्टर्स के साथ सीन को उस वर्चुअल दुनिया के अंदर शूट किया गया है। यह तकनीक बजट को कम कर देती है। कोरोनाकाल में इस तकनीक ने रास्ते खोले। जब मैं इंडस्ट्री में आया था तो एक्चुअल फिल्म, साउंड एडिट होते थे। फिर एडिटिंग मशीनें आईं। कैमरा में भी बदलाव आया। एचडी कैमरा, फिर बीटा कैमरा आए। सब काम डिजिटल हो रहा है। जब दुनिया ही डिजिटल वल्र्ड में है तो मुमकिन नहीं कि इसका असर हम पर न हो।’

थ्रीडी में था मेरा सपना

‘जब हमने तय किया था कि फिल्म ‘विक्रांत रोणा’ को हम थ्रीडी में लेकर आएंगे तो सवाल था कि क्या थ्रीडी इसमें काम करेगा। हमें पता था कि थ्रीडी में फिल्म अच्छी लगेगी, लेकिन दिक्कत यह थी कि क्या मुझे वह टीम मिलेगी, जो उसे वाकई पर्दे पर अच्छा दिखाएगी। सपना देखना अलग बात है, लेकिन उसे सच करने के लिए कई प्रतिभाशाली लोगों की जरूरत थी। शुक्र है कि हमें अच्छी टीम मिली।’

अनूप भंडारी, निर्देशक

बजट से खा जाते हैं मात

‘यहां क्वालिटी की समस्या नहीं है, समस्या बजट की है। आप वीएफएक्स पर जितना खर्च करेंगे वो उतना ही अच्छा बनेगा, पर हमारे पास बजट सीमित होते हैं। वीएफएक्स में टाइम देना पड़ता है। उसमें हर मिनट की लागत होती है, क्योंकि बहुत सारे लोग प्रति घंटे के हिसाब से चार्ज करते हैं। जब बजट नहीं होगा तो आप 10 घंटे का काम एक घंटे में करेंगे तो वो क्वालिटी नहीं आएगी।’

अजय देवगन 

Edited By: Vaishali Chandra

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