मुंबई। के आसिफ की फ़िल्म ‘मुगल-ए-आजम’ भारतीय सिनेमा के सिर का ताज है। यह अपने दौर की सबसे बड़ी और यादगार फ़िल्मों में शुमार है। हिंदी सिनेमा के सौ साल के इतिहास में अगर शीर्ष की पांच फ़िल्में चुनी जायें तो 'मुगल-ए-आजम’ का नाम सबसे ऊपर लिखा जाएगा। हिंदी सिनेमा को यह माइलस्टोन फ़िल्म देने वाले डायरेक्टर के आसिफ का आज बर्थडे है। अगर वो आज हमारे बीच होते तो अपना 96 वां जन्मदिन मना रहे होते।

के आसिफ का पूरा नाम था करीमुद्दीन आसिफ। उनका जन्म 14 जून, 1922 को हुआ था और 9 मार्च, 1971 को वह इस दुनिया से रुख्सत हो गए। लेकिन, उन्होंने अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ दी कि जब तक धरती रहेगी लोगों की ज़ुबान पर ‘मुगल-ए-आजम’ का नाम रहेगा! के आसिफ निर्देशित इस फ़िल्म ने हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के कई लोगों को प्रभावित किया, जिनमें संजय लीला भंसाली प्रमुख हैं। वे बताते हैं कि उन्होंने ‘बाजीराव मस्तानी’ इसी फ़िल्म को ट्रिब्यूट देने के लिए बनाई। इस फ़िल्म के क्लासिक शीशमहल दृश्य की प्रेरणा ना सिर्फ बाजीराव मस्तानी, बल्कि ’प्रेम रतन धन पायो’ में भी ली गयी है। ‘मुगल-ए-आजम’ से जुड़ी एक दिलचस्प बात ये है कि इस फ़िल्म में युवा दिलीप कुमार का किरदार निभाने के लिए उस्ताद ज़ाकिर हुसैन से बात की गयी थी, लेकिन बाद में बात नहीं बन पाई तो यह किरदार जलाल आगा ने निभाया। दिलीप कुमार के लिए भी यह फ़िल्म उनके कैरियर की सबसे महान फ़िल्मों में शामिल है।

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कहा जाता है, कि इस फ़िल्म के निर्माण में के आसिफ इस कदर अपनी आर्थिक स्थिति को बिगाड़ चुके थे कि उन्होंने पान और सिगरेट भी उधार पर लेना शुरू कर दिया था। फ़िल्म में कृष्ण की जो मूर्ति इस्तेमाल की गई है, वो शुद्ध सोने से बनी थी। इससे पहले किसी फ़िल्म में इस तरह बारीकियों का ख्याल नहीं रखा गया था। बता दें कि फ़िल्म के गीत 'मोहब्बत जिंदाबाद' में मोहम्मद रफ़ी ने 100 कोरस सिंगर्स के साथ यह गाना गाया था। ऐसी कई कहानियां इस फ़िल्म को लेकर सुनने को मिलती हैं। इसीलिए ‘मुगल-ए-आजम’ सिनेमा की दुनिया का मास्टर पीस मानी जाती है। फ़िल्म में दिलीप कुमार, मधुबाला और पृथ्वीराज कपूर के किरदार आज भी क्लासिक माने जाते हैं।

निर्देशक के आसिफ की फ़िल्म ‘मुगल-ए-आजम’ जिन्होंने देखी है, उन्हें इसका ये गाना ‘जब प्यार किया तो डरना क्या...’ जरूर याद होगा। भव्य सेट में लगे शीशों में नृत्य करती अभिनेत्री मधुबाला के अक्स को देखकर दर्शक शीशमहल की शानो-शौकत से दंग रह गए थे। तब इस गाने को फ़िल्माने पर दस लाख रुपये का खर्च आया था! उस वक़्त तो इतने बजट में एक पूरी फ़िल्म तक बन जाया करती थी! उत्तर प्रदेश के इटावा से निकले के आसिफ ने मुंबई में एक ही फ़िल्म से ऐसा डंका बजाया कि उनके नाम के बिना सिनेमा का हर इतिहास अधूरा है!

मंटो ने के आसिफ के बारे में एक जगह लिखा है कि उन्होंने कुछ ख़ास किया तो नहीं था, पर खुद पर भरोसा इतना था कि सामने वाला हर इंसान घबरा जाता था। के आसिफ ने अपने जीवन में सिर्फ दो फ़िल्में ही बनाई। ‘फूल’ (1945) और ‘मुगल-ए-आजम’ (1960)। उनकी पहली फ़िल्म तो कोई कमाल नहीं कर सकी लेकिन, दूसरी फ़िल्म ‘मुगल-ए-आजम’ पर इतने फूल बरसे जिसकी महक आज भी ताज़ा है!

इस फ़िल्म को बनाने में उन्हें लगभग 14 साल लगे थे। ‘मुग़ल-ए-आज़म’ उस दौर की सबसे महंगी फ़िल्म थी, जिसकी लागत तक़रीबन 1.5 करोड़ रुपये बताई जाती है। फ़िल्म से जुड़ा एक यह किस्सा भी काफी प्रसिद्ध है कि जब फ़िल्म के एक दृश्य में पृथ्वीराज कपूर को रेत पर नंगे पांव चलना था और उस दृश्य की शूटिंग राजस्थान में हो रही थी जहां की रेत तप रही थी। उस दृश्य को करने में पृथ्वीराज कपूर के पांव पर छाले पड़ गए थे। जब ये बात के आसिफ को पता चली तो उन्होंने भी अपने जूते उतार दिए और नंगे पांव गर्म रेत पर कैमरे के पीछे चलने लगे। के आसिफ के इस तरह के समर्पण के कई किस्से उनकी इस फ़िल्म से जुडी हुई हैं!

एक यह किस्सा भी काफी मशहूर है कि संगीतकार नौशाद इस फ़िल्म के लिए बड़े गुलाम अली साहब की आवाज़ चाहते थे। लेकिन, गुलाम अली साहब ने ये कहकर गाने से मना कर दिया कि वो फ़िल्मों के लिए नहीं गाते। लेकिन, के आसिफ ज़िद पर अड़ गए कि गाना तो उनकी ही आवाज में रिकॉर्ड होगा। उनको मना करने के लिए गुलाम साहब ने कह दिया कि वो एक गाने के 25000 रुपये लेंगे। बता दें कि उस दौर में लता मंगेशकर और रफ़ी जैसे गायकों को एक गाने के लिए 300 से 400 रुपये ही मिलते थे। के आसिफ ने उन्हें कहा कि गुलाम साहब आप बेशकीमती हैं, ये लीजिये 10000 रुपये एडवांस। अब गुलाम अली साहब के पास कोई बहाना नहीं था। इस तरह से वो फ़िल्म में गाने को राज़ी हुए!

बहरहाल, आपको बता दें कि यह फ़िल्म कई लोगों के जीवन में बदलाव लेकर आया। इस फ़िल्म के बाद से ही दिलीप कुमार और मधुबाला का 9 साल पुराना रिश्ता ख़त्म हो गया। गौरतलब है कि दोनों कलाकारों ने पूरी फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक दूसरे से बात तक नहीं की। इसी दौरान के आसिफ ने दिलीप कुमार की बहन अख्तर बेगम से शादी कर ली। एक बार अख्तर बेगम और आसिफ में झगड़ा हुआ। दिलीप बीच-बचाव करने पहुंचे तो आसिफ ने कह दिया कि अपना स्टारडम मेरे घर से बाहर रखो। दिलीप कुमार उनकी इस बात से इतने नाराज हुए कि वो फ़िल्म के प्रीमियर तक में नहीं गए थे। उन्होंने ये फ़िल्म भी रिलीज़ होने के 10 साल बाद देखी।

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‘मुगल-ए-आजम’ 5 अगस्त 1960 को रिलीज़ हुई थी और इसे उस साल फ़िल्मफेयर से बेस्ट फ़िल्म का पुरस्कार भी मिला। ‘मुगल-ए-आजम’ के बाद के आसिफ ने एक और फ़िल्म ‘लव एंड गॉड’ पर काम शुरू किया लेकिन, तमाम उतार-चढ़ावों से गुजरती उनकी यह फ़िल्म अधूरी ही रह गई!

By Hirendra J