कभी विकल्प बनकर नहीं उभर पाए, हमेशा राष्ट्रीय दलों के आगे हांफ गए क्षेत्रीय दल
तमाम दल उभरे लेकिन धीरे-धीरे राष्ट्रीय दलों के आगे हांफ गए। एक बार फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दल चुनावी रण में अपना दमखम दिखाने का दम तो भरते नजर आ रहे हैं।
गणेश जोशी, हल्द्वानी। ऐसा नहीं कि उत्तराखंड में तीसरे विकल्प की संभावना ही नहीं थी। तमाम दल उभरे, लेकिन धीरे-धीरे राष्ट्रीय दलों के आगे हांफ गए। एक बार फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दल चुनावी रण में अपना दमखम दिखाने का दम तो भरते नजर आ रहे हैं, जिसमें सबसे बड़ा दल उक्रांद भी शामिल है, लेकिन इस दल का भी संगठनात्मक रूप से जमीनी आधार कहीं भी नजर नहीं आता। आलम यह है कि प्रदेश में पांच दशक से सक्रिय इस क्षेत्रीय दल से भी एक भी प्रतिनिधि संसद नहीं पहुंच सका। उत्तराखंड (अविभाजित उत्तर प्रदेश) में 24 जुलाई 1979 में उत्तराखंड क्रांति दल का उदय हुआ। इस दल से क्षेत्रीय जनता को उम्मीद जगी। इसमें कुमाऊं व गढ़वाल की तमाम बड़ी हस्तियां शामिल हुई।
सबसे खास यह है कि 1980 के लोकसभा चुनाव में उक्रांद के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. डीडी पंत ने अल्मोड़ा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन वह 27 हजार वोट से हार गए। इसके बाद इस दल से 1989 के लोकसभा चुनाव में दो वरिष्ठ नेता लड़े। इसमें अल्मोड़ा सीट से काशी सिंह ऐरी केवल सात हजार वोट से हार गए थे और टिहरी से इंद्रमणि बड़ौनी को सिर्फ 11 हजार वोट से पराजित होना पड़ा था। पार्टी इस चुनाव में अपने प्रदर्शन से बेहद उत्साहित थी। अलग राज्य की मांग शुरू कर दी, जो नौ नवंबर, 2000 को अंजाम तक पहुंच गई। लेकिन, पार्टी राजनीतिक लिहाज से पिछड़ गई। लोकसभा चुनाव में 1989 जैसा प्रदर्शन फिर नहीं दोहराया जा सका। जबकि, पार्टी 2014 तक लगातार चुनाव लड़ते रही। अधिकांश समय प्रत्याशी जमानत भी नहीं बचा सके। इस चुनाव में भी पार्टी के बिखरे नेता एकजुट होकर दमखम दिखाने का हवाई जोश भर रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर संगठनात्मक ढांचे का कहीं भी पता नहीं है।
राज्य में नहीं उभर सका तीसरा विकल्प
1952 से 1977 में कांग्रेस का वर्चस्व था, लेकिन तब भी कुमाऊं में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और गढ़वाल में कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं का दबदबा था। इस दल से भारत भूषण समेत तमाम नेता जीत, लेकिन यहां पर सशक्त रूप से तीसरा विकल्प खड़ा नहीं हो सका। इसके अलावा उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी समेत कुछ अन्य स्थानीय दल विकल्प के रूप में खुद को पेश करते रहे, लेकिन एक तरह के जल, जंगल व जमीन के मुद्दे को उठाने के बावजूद ये दल व संगठन कभी एकजुट नहीं हो सके। इसका कारण यह रहा कि इन दलों में से आज तक एक भी सांसद नहीं बन सका। राजनीतिक विश्लेषक चारु तिवारी राज्य में विकल्प की संभावनाएं बहुत हैं। क्षेत्रीय संगठन बेईमान नहीं हैं। क्षेत्रीय दलों के नेता राज्य की यथास्थिति को लेकर अधिक समझ रखते हैं, लेकिन इन्होंने कभी आंदोलन के आगे संगठन की मजबूती पर ध्यान नहीं दिया। यही कारण रहा कि क्षेत्रीय दल पिछड़ते रहे।
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