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    Election 2024: कुर्सी नहीं पकड़ सके ये 'धरती पकड़'; किसी ने 300 तो किसी ने 238 बार लड़ा चुनाव; पढ़ें इसके पीछे की रोचक कहानी

    Updated: Tue, 16 Apr 2024 06:38 PM (IST)

    Lok Sabha Election 2024 आज बात देश के पांच धरती पकड़ नेताओं की करेंगे। इनमें से एक नेता 300 बार से अधिक चुनाव हार चुका है। वहीं 238 बार चुनाव हारने वाले के. पद्मराजन इस बार फिर चुनावी समर में उतरे हैं। हर चुनाव में हार मिलने के बाद भी इन नेताओं ने हार नहीं मानी। तो आइये पढ़ते हैं पांच धरती पकड़ की रोचक कहानी...

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    लोकसभा चुनाव 2024: पढ़ें देश के पांच धरती पकड़ नेताओं के बारे में।

    चुनाव डेस्क, नई दिल्ली। कुछ रोज बाद ही 18वीं लोकसभा के लिए पहले चरण का मतदान होना है। इस बीच जेहन में उन नेताओं की छवि भी उभरती है, जिन्‍होंने चुनाव में अजीबोगरीब रिकॉर्ड बनाया है। किसी ने हार का रिकॉर्ड बनाया तो किसी ने जीत का। 

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    तीसरे चरण के नामांकन के तहत फतेहपुर सीकरी की खेरागढ़ तहसील के नगला दूल्हे खां के 77 वर्षीय हसनूराम अंबेडकरी ने सौ बार चुनाव लड़ने का रिकॉर्ड बनाने को आगरा सुरक्षित और फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीटों से नामांकन पत्र लिए। 

    आज में हम आपके लिए ऐसे ही नेताओं की कहानी लाए हैं, जिन्‍हें लोग धरती पकड़ के नाम से जानते हैं। इन नेताओं को धरती पकड़ क्‍यों बुलाया जाता है? इनका नाम क्‍या रिकॉर्ड हैं? ऐसे ही कई सवालों के जवाब यहां पढ़िए... 

    हम आपको बता रहे हैं देश देश के पांच धरती पकड़ नेताओं के बारे में। इन नेताओं को जीत से ज्यादा हार पसंद है। सियासत मे सबसे पहले 'धरती पकड़' शब्द का इस्तेमाल मूलरूप से काका जोगिंद्र सिंह के लिए किया गया था। ये ऐसे नेता थे, जिन्‍हें हर चुनाव में हार मिली। इसके बावजूद वे हिम्मत नहीं हारे। निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर 300 से अधिक चुनाव हारने की वजह से उन्हें 'धरती पकड़' उपनाम मिला था। 

    कौन थे काका जोगिंद्र सिंह?

    1918 में पाकिस्तान के गुजरांवाला में जन्म जोगिंद्र सिंह की पहचान भी धरती पकड़ नेता की थी। 300 बार चुनाव का नामांक करने वाले जोगिंद्र सिंह का परिवार बंटवारे के बाद उत्तर प्रदेश के बरेली में आकर बस गया।

    काका जोगिंद्र सिंह ने 1962 से लगातार चुनाव लड़ा और कई राज्यों के चुनाव में 300 बार नामांकन दाखिल किया। उनका प्रचार का तरीका अद्भुत था। वे कहते थे कि चुनाव में खड़ा हूं, मगर मेहरबानी करके मुझे वोट न देना। साल 1998 में काका जोगिंद्र सिंह का देहांत हो गया था।

    परमानंद तोलानी

    18 से अधिक चुनाव लड़ने और हारने वाले परमानंद तोलानी की पहचान धरती पकड़ प्रत्याशी के तौर पर होती है। परमानंद तोलानी मध्य प्रदेश के इंदौर के रहने वाले हैं और रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े हैं। तोलानी ने 1989 में पहली बार चुनाव लड़ा था। तब से उनका चुनाव लड़ने का यह सिलसिला जारी है। परमानंद से पहले उनके पिता भी 30 साल तक निर्दलीय चुनाव लड़ चुके हैं।

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    पुखराज सोनल

    राजस्थान के पुखराज सोनल की पहचान भी धरती पकड़ के रूप में होती है। पुखराज 1993 से चुनाव लड़ रहे हैं। अब तक 10 चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन सभी में उन्हें हार का सामना करना पड़ा है। वे विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भी ताल ठोक चुके हैं। 2004 में पुखराज ने जोधपुर लोकसभा सीट से नामांकन दाखिल किया था। इसके अलावा वे 2008 में राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ सरदारपुरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था।

    हसनूराम अंबेडकरी

    फतेहपुर सीकरी के हसनूराम अंबेडकरी 98 बार चुनाव लड़ चुके हैं। चुनाव लड़ने का उनका जब्जा ऐसा था कि उन्होंने सरकारी नौकरी तक छोड़ दी। 2024 के लोकसभा चुनाव में वे एक बार फिर मैदान में हैं। 77 वर्षीय हसनूराम फतेहपुर सीकरी के नगला दूल्हे खां के रहने वाले हैं।

    1985 में चुनाव लड़ने की खातिर हसनूराम ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। वे राजस्व विभाग में अमीन थे। खास बात यह है कि हसनूराम इस बार का चुनाव प्रधानमंत्री सम्मान निधि के रुपयों से लड़ेंगे।

    के. पद्मराजन

    हार को पंसद करने वाले के. पद्मराजन लोकसभा चुनाव 2024 में भी मैदान में हैं। वे 238 बार चुनाव हार चुके हैं। इस बार तमिलनाडु की धर्मपुरी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। पंचर की दुकान चलाने वाले पद्मराजन पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, करुणानिधि, जयललिता और बीएस येदियुरप्पा के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं।

    क्या है धरती पकड़?

    धरती पकड़ शब्द का इस्तेमाल राजनीति में दशकों से हो रहा है। लगातार चुनाव में शिकस्त मिलने के बावजूद हिम्मत न हारने वाले प्रत्याशियों को धरती पकड़ की उपाधि जनता देती है। मगर इस शब्द का संबंध कुश्ती से है। दरअसल, यह कुश्ती का एक दांव है। इसमें हारता हुआ पहलवान धरती को मजबूती से पकड़ लेता है। हालांकि बाद में इस संबध का इस्तेमाल राजनीत में खूब होने लगा।

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