रांची, [प्रदीप सिंह]। Jharkhand Assembly Election 2019 प्रत्याशियों को लेकर तेजी से साफ हो रही तस्वीर के बीच भाजपा विरोधी गठबंधन में मतभेद भी पनप रहा है। बाहरी तौर पर यह फिलहाल भले नहीं दिख रहा हो, लेकिन भितरखाने इसपर मंथन चल रहा है। दरअसल कुछ सीटों पर कांग्रेस ने अपेक्षाकृत कमजोर प्रत्याशी दिए हैं। इसके अलावा एकदम नए चेहरे को सामने लाने का प्रबल विरोध हो रहा है।

कांग्रेस की जिन सीटों पर मतभेद ज्यादा है वहां नेताओं के बड़े तबके ने विरोध का झंडा बुलंद कर रखा है। इसका आभास कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को है। कहा जा रहा है कि कमजोर प्रत्याशी देने का फायदा भाजपा उठा सकती है। ऐसे में यह भी दबाव पड़ रहा है कि इन प्रत्याशियों को वापस लेकर नए सिरे से प्रत्याशी खड़े किए जाएं। गठबंधन में प्रत्याशियों के चयन में गंभीरता को लेकर आपसी समन्वय का भी अभाव दिखता है।

यह जमशेदपुर में सीएम के खिलाफ ताल ठोक रहे सरयू राय के मामले में स्पष्ट नजर आया। जब हेमंत सोरेन सरयू राय को समर्थन देने की अपील जारी कर रहे थे तो आनन-फानन ने कांग्रेस ने वहां से प्रत्याशी का एलान कर दिया। हालांकि झारखंड मुक्ति मोर्चा के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य इससे इतफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि गठबंधन के दलों के बीच बेहतर समन्वय है और इसका बेहतर परिणाम विधानसभा चुनाव के बाद दिखेगा।

उधर कांग्रेस के प्रदेश मुख्यालय में प्रभारी आरपीएन सिंह के समक्ष विरोध के बाद कई नेताओं ने दिल्ली में कैंप कर रखा है। फजीहत इस स्तर पर हो रही है कि सीटों पर प्रत्याशी को लेकर कोई सर्वे नहीं हुआ और पैसे लेकर फैसले लिए गए। वैसे इसपर कांग्रेस के नेता खुलकर कुछ बोलना भी नहीं चाहते।

इन कद्दावर नेताओं ने पाला बदला या हैं हाशिये पर

  1. सुबोधकांत सहाय - पूर्व केंद्रीयमंत्री सुबोधकांत सहाय विधानसभा चुनाव में हाशिये पर हैं। कांग्रेस का चेहरा रहे इस अनुभवी नेता को कोई खास जिम्मेदारी नहीं दी गई है। बताते हैं कि सुबोधकांत सहाय खुद भी चुनाव लडऩे को इच्छुक थे लेकिन उन्हें मना कर दिया गया। कांग्रेस में रणनीतिक मोर्चे पर भी उनकी कोई मदद नहीं ली जा रही है। ऐसा रुख पार्टी को नुकसान पहुंचा सकता है।
  2. प्रदीप कुमार बलमुचू -  दो बार झारखंड प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष रहे प्रदीप कुमार बलमुचू अब कांग्रेसी नहीं रहे। उन्होंने आजसू पार्टी ज्वाइन कर ली है। बलमुचू कांग्रेस से राज्यसभा के सदस्य भी रहे हैं। एक कद्दावर नेता के तौर पर उनकी छवि रही है, लेकिन कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति से आजिज जाकर उन्होंने पार्टी छोड़ दी और अब क्षेत्रीय दल आजसू की राजनीति करेंगे। उन्होंने घाटशिला से विधानसभा चुनाव लडऩे का फैसला किया है। बलमुचू के नेतृत्व में कांग्रेस ने विगत लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बेहतर परिणाम दिए हैैं।
  3. सुखदेव भगत - कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके सुखदेव भगत अब भाजपा में जा चुके हैं। सुखदेव भगत को संसदीय मामलों की बेहतर जानकारी हैं और जनसमुदाय में अच्छी पकड़ भी है। विधानसभा चुनाव में इसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ सकता है।
  4. मनोज कुमार यादव - कांग्रेस विधायक दल के नेता रह चुके मनोज कुमार यादव अरसे से पार्टी में उपेक्षित महसूस कर रहे थे। उत्तरी छोटानागपुर खासकर हजारीबाग और इसके आसपास के इलाकों में इनका खासा प्रभाव है। अब उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया है। वे अपने प्रभाव क्षेत्र वाले इलाकों में परिणाम प्रभावित कर सकते हैैं।
  5. फुरकान अंसारी - कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में शुमार फुरकान अंसारी संताल परगना के अलावा अन्य क्षेत्रों में पकड़ रखते हैं। उनके पुत्र इरफान अंसारी जामताड़ा से विधायक हैं। फुरकान अंसारी लोकसभा का चुनाव लडऩा चाहते थे लेकिन उन्हें राज्यसभा सदस्य बनाने का आश्वासन देकर शांत कराया गया था। फिलहाल पार्टी के नीतिगत मसलों में उनकी ज्यादा राय नहीं ली जाती। विधानसभा चुनाव के दौरान वे सक्रिय हैं।

Posted By: Alok Shahi

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