विचार: वैश्विक थपेड़ों से जूझता रुपया
डॉलर की तुलना में रुपया दशकों से गिर रहा है जिसकी रफ्तार पिछले दशक में और बढ़ी है और वह 66 से गिरकर 96 पर जा पहुंचा है।
HighLights
पश्चिम एशिया युद्ध से ऊर्जा, खाद के दाम बढ़े।
विदेशी निवेश निकासी से रुपये पर दबाव बढ़ा।
निर्यात और आर्थिक सुधार रुपये को स्थायी रूप से उबारेंगे।
शिवकांत शर्मा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहले देशवासियों से ऊर्जा की किफायत करने की अपील की और फिर चेतावनी दी कि पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण दुनिया में आर्थिक मंदी आ सकती है। उनके वक्तव्यों के पीछे चार चिंताएं काम कर रही थीं। होर्मुज जलमार्ग बंद होने से तेल, गैस और खाद के दाम डेढ़ गुना से अधिक हो गए जिसके कारण भारत का ऊर्जा और खाद आयात बिल लगभग डेढ़ गुना हो गया है। ऊर्जा और खाद के दाम बढ़ने से देश में महंगाई बढ़ने और बजट गड़बड़ाने का खतरा पैदा हो गया है। विदेशी निवेशक पिछले दो साल से भारत से अपनी पूंजी निकाल रहे हैं और अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने के आसार से इसकी रफ्तार और तेज हो सकती है। ऊर्जा और खाद के आयात का बिल बढ़ने और विदेशी पूंजी के पलायन से रुपया सस्ता हो रहा है, जिसकी वजह से आयात महंगे होते जा रहे हैं।
डालर की तुलना में रुपया दशकों से गिर रहा है जिसकी रफ्तार पिछले दशक में और बढ़ी है और वह 66 से गिरकर 96 पर जा पहुंचा है। इसमें से 6.1 प्रतिशत की गिरावट ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद से हुई है। रुपया डालर की तुलना में ही नहीं, बल्कि जापानी येन को छोड़कर लगभग हर हार्ड करेंसी की तुलना में कमजोर पड़ा है। पिछले साल भर में तो वह पाकिस्तानी रुपये और बांग्लादेशी टके की तुलना में भी 10 प्रतिशत से अधिक गिरा, जिसकी वजह से भारत में मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि पाकिस्तानी रुपये का ग्राफ देखें तो उसका भाव 2016 से 2024 के बीच डालर की तुलना में भारतीय रुपये से दोगुनी रफ्तार के साथ गिरा है। 2022 से 2024 के बीच बांग्लादेशी टके की भी यही हालत हुई। 2024 के बाद पाकिस्तानी रुपये और बांग्लादेशी टके की दरों में तो थोड़ी स्थिरता आई, लेकिन भारतीय रुपये के गिरने की रफ्तार कहीं तेज रही। रुपये की तुलना में इन दोनों मुद्राओं की कीमत में थोड़ा सुधार दिखाई देने की असली वजह यही है।
हकीकत यही है कि मुद्रा की विनिमय दर किसी देश की अर्थव्यवस्था की ताकत या कमजोरी का पैमाना नहीं होती। मिसाल के तौर पर जापानी येन का भाव इस समय लगभग 60 पैसे है। तो क्या भारत की अर्थव्यवस्था जापान से डेढ़ गुना मजबूत मान ली जाए? इसी तरह यूरो आने से पहले 1998 में एक रुपया 40 इतालवी लीरा का होता था। तो क्या भारत इटली से चालीस गुना विकसित था? किसी देश की मुद्रा की कीमत उसकी जीडीपी और जारी मुद्रा की संख्या के आधार पर तय होती है और विनिमय दर मुद्रा की मांग के आधार पर चढ़ती-गिरती है। जिस देश का निर्यात आयात से अधिक होता है और जिसकी मुद्रा को लोग निवेश के लिए जमा रखना चाहते हैं, उसकी मांग बढ़ती है। परिणामस्वरूप उसकी विनिमय दर भी बढ़ती है। हालात इसके उलट होने पर मुद्रा की मांग घटती है और विनिमय दर भी गिर जाती है। इसलिए न तो मुद्रा झंडे की तरह देश की आन होती है और न ही उसकी अर्थव्यवस्था का पैमाना।
भारत में सकल एफडीआइ या विदेशी निवेश की मात्रा में कमी नहीं आ रही। वह लगातार बढ़ रही है, लेकिन भारत से वापस जाने वाले विदेशी निवेश की मात्रा भी पिछले तीन सालों से बढ़ रही है। इसके दो कारण बताए जाते हैं। एक तो विदेशी निवेशक उन बाजारों का रुख कर रहे हैं जहां एआइ, सेमीकंडक्टर और डाटा के क्षेत्रों में नए आविष्कार हो रहे हैं। इन कंपनियों के दाम डाट-काम के दिनों की तरह हफ्तों के भीतर दोगुने-तिगुने होते जा रहे हैं। हालांकि बड़े विदेशी निवेशकों के लिए अपना निवेश एक साथ बेचना आसान नहीं होता, क्योंकि बेचने की भनक पड़ते ही दाम और मुनाफा गिरने लगता है।
विडंबना इस बात की है कि उनकी यह मुश्किल भारत में लोकप्रिय हुए म्यूचुअल फंडों ने आसान की है। अमेरिकी निवेश बैंक जेफरीज का कहना है कि म्यूचुअल फंडों के जरिये निवेश करने वाले भारतीय निवेशकों की मांग की आड़ में विदेशी निवेशक अपना पैसा शेयर बाजार में गिरावट लाए बिना निकाल कर वहां लगा रहे हैं, जहां एक महीने में उतना मुनाफा मिल रहा है जो भारत में एक साल में नहीं मिलता। दूसरा कारण खाड़ी से पैदा हुआ ऊर्जा संकट है, जिससे भारत का बजट गड़बड़ाने, व्यापार घाटा और महंगाई बढ़ने और रुपया गिरने का खतरा पैदा हो गया है। रुपया गिरने से विदेशी निवेशकों के निवेश की कीमत भी गिरती है। इसीलिए वे भाग रहे हैं।
रुपया गिरने से सरकार पर राजनीतिक दबाव भी पड़ता है, जिसे कम करने के लिए रिजर्व बैंक डालर बेचकर रुपये को सहारा देने की कोशिश कर सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की पूर्व उपनिदेशक गीता गोपीनाथ का कहना है कि रिजर्व बैंक को अपना लगभग 700 अरब डालर का विदेशी मुद्रा भंडार रुपया उबारने में बर्बाद नहीं करना चाहिए, क्योंकि सस्ता रुपया भारत के निर्यातकों को लाभ पहुंचाएगा। वे विदेशी मंडियों में कड़ी प्रतिस्पर्धा देकर अधिक माल बेच सकेंगे, जिससे विदेशी मुद्रा की आमद बढ़ेगी। हालांकि इसका दूसरा और राजनीतिक रूप से जोखिम भरा पहलू यह है कि रुपया सस्ता होने से आयात महंगे होंगे, जिनमें तेल और खाद प्रमुख हैं। इनसे हर चीज महंगी होगी और विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। तेल कंपनियों को प्रतिदिन हो रहे 750 करोड़ रुपये के घाटे को कम करने के लिए यदि पेट्रोल, डीजल और गैस के दाम बढ़ाए गए तो उससे मिली राहत से रुपये की गिरावट बेअसर हो जाएगी।
इसलिए नीति आयोग के पूर्व प्रमुख अमिताभ कांत का कहना है कि इस संकट को अवसर में बदलकर उन कार्यों को पूरा करना चाहिए, जो हमें जलवायु रक्षा के लिए करने चाहिए थे। तेल और खाद के बढ़े हुए दामों से लोग दोनों की किफायत करने और स्वच्छ ऊर्जा अपनाने को विवश होंगे। इससे जलवायु को बेहतर बनाने के साथ-साथ एआइ, ऊर्जा और डाटा भंडारण के क्षेत्रों में नई खोजों की प्रेरणा मिलेगी। असल में रुपये को स्थायी रूप से तभी उबारा जा सकता है जब निर्यात और विदेशी निवेश बढ़ें। ये दोनों काम आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों के बिना नहीं हो सकते।
(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)







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