हाल ही में धर्म-जाति के नाम पर वोट मांगने संबंधी याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लिए गए निर्णय के बीच उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में होने वाले विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान हो गया। चार फरवरी से आरंभ हो रहे चुनावी महासमर में कुल 690 विधानसभा सीटों पर चरणबद्ध मतदान के पश्चात 11 मार्च को मतगणना होगी। विभिन्न मीडिया संस्थानों द्वारा करवाए गए चुनावी सर्वेक्षणों और सबसे महत्वपूर्ण शीर्ष अदालत के हालिया निर्णय ने कई मायनों में भविष्य के राजनीतिक परिदृष्य को स्पष्ट कर दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्णय में चुनाव के उपरांत धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगने को पूर्ण रूप से अवैध ठहराया है। सात न्यायाधीशों की खंडपीठ ने चार-तीन के बहुमत से यह फैसला दिया है। अब कोई भी प्रत्याशी अपने धर्म, जाति, भाषा के आधार पर वोट नहीं मांग सकेगा और किसी वर्ग विशेष के मतदाताओं से एक उम्मीदवार या पार्टी को वोट देने की साझा अपील भी नहीं कर सकेगा। अदालत ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) की नए सिरे से व्याख्या करते हुए उसमें मतदाताओं को भी जोड़ दिया है। अब तक इस धारा के दायरे में केवल उम्मीदवार आते थे। स्वाभाविक रूप से शीर्ष अदालत का निर्णय स्वागतयोग्य है। किंतु देश में मुस्लिम राजनीति के धुरी और स्वघोषित पंथनिरपेक्षक उक्त निर्णय की तुलना सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 1995 में दिए उस फैसले से कर रहे हैं, जिसमें अदालत ने हिंदुत्व को एक धर्म न मानकर, जीवनशैली का आधार माना था।
सीटों के संदर्भ में उत्तर प्रदेश सबसे महत्वपूर्ण राज्य है और यहां सपा-बसपा जैसे क्षत्रपों के साथ कांग्रेस जैसे स्वघोषित सेक्युलरिस्टों की राजनीति केवल जातीय और मजहबी गठजोड़ पर ही केंद्रित है। अपनी स्थापना से ही (1920 के आसपास) वामपंथी और प्रगतिवादी-उदारवादी होने का दावा करने वाले जहां एक ओर हिंदुओं को जाति, भाषा और प्रदेश के नाम पर बांटते रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उन्होंने मुस्लिमों को मजहब के नाम पर एकजुट करने का सदैव प्रयास किया है। वामपंथियों द्वारा स्वतंत्रता से पूर्व जिन्ना के पाकिस्तान की मांग का समर्थन करना इसी चिंतन का परिणाम है। अगस्त 1947 से पूर्व का अखंड भारत आज भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश में विभाजित है। पाकिस्तान घोषित इस्लामी राष्ट्र है तो बांग्लादेश में भी इस्लामी कट्टरपंथियों का बोलबाला है। इन दोनों देशों में हिंदू, सिख, ईसाई और बौद्ध समुदाय के लोग दोयम दर्ज के नागरिक हैं। वहीं हिंदू बहुल भारत की बहुलतावादी सनातन संस्कृति के अनुरूप यहां सभी पंथ अपनी पहचान बनाए हुए हैं। यह सही है कि खंडित भारत में मुस्लिम समुदाय पिछड़ा हुआ है। क्या इसका कारण सामाजिक भेदभाव है? रक्तरंजित बंटवारे के समय मुस्लिम समाज का अभिजात्य और संपन्न वर्ग पाकिस्तान चला गया। भारत में जो शेष मुसलमान रह गए उनमें से अधिकांश आज भी मध्यकालीन मानसिकता से ग्रसित हैं। बहुपत्नी, परिवार नियोजन से विरक्ति, मदरसे की मजहबी शिक्षा से लगाव, औरतों को पर्दे में कैद रखना आदि वे बुनियादी समस्याएं हैं जिनसे उनका आर्थिक पक्ष प्रभावित है। न केवल कट्टर मुसलमान, बल्कि उनके वोटबैंक पर नजर रखने वाले सेक्युलरिस्ट भी मुस्लिम समाज में व्याप्त इन कुरीतियों के समर्थकों को मजबूत करने का काम करते हैं। इसी कारण देश में मुस्लिमों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति सुधर नहीं पाई है।
इसके विपरीत हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ आवाज कई शताब्दियों से ही मुखर होनी शुरू हो गई थी। हिंदू समाज की पहल पर ही स्वतंत्र भारत में संविधान सभा ने वंचित वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था की और समय-समय पर उनके खिलाफ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए सख्त कानून भी बनाए। यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि प्रबुद्ध हिंदू समाज गुलामी के काल में दलितों के साथ जो अन्याय होता रहा है उसका परिमार्जन करना चाहता है। दलित-मुस्लिम गठबंधन से अल्पकाल के लिए राजनीतिक हितों की पूर्ति तो हो सकती हैं, किंतु उससे सामाजिक न्याय की प्राप्ति असंभव है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में दलितों का आर्थिक, शारीरिक और सामाजिक शोषण इस अस्वाभाविक गठबंधन का ज्वलंत उदाहरण है। क्या यह सत्य नहीं कि इस्लाम दर्शन में बंधुत्व केवल मुस्लिमों तक ही सीमित है, शेष उनके लिए कुफ्र और काफिर हैं? पुस्तक राइटिंग एंड स्पीचेज-पाकिस्तान या पार्टिशन ऑफ इंडिया के खंड-सात के अनुसार संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर का मानना था कि जीवन के पंथनिरपेक्ष स्वरूपों का मुस्लिम राजनीति में कोई स्थान नहीं है। अमीर-गरीब के बीच के भेद, पूंजी, श्रम, जमींदार और बंधुआ, तर्क और अंधविश्वास जैसे पहलुओं पर यह समाज कोई ध्यान नहीं देता। वह केवल एक भेद को मानते हैं और वह है हिंदू और मुसलमानों के बीच का अंतर।
यक्ष प्रश्न है कि यदि हिंदू दर्शन, इतिहास को खंगालकर ऐसे संदर्भों पर निरंतर चर्चा की जा सकती है जिसमें जातिगत भेदभाव, अन्याय और विद्वेष प्रमाणित होता हो तो फिर हिंदुओं के ऊपर मजहब के नाम पर जो सदियों से अत्याचार होता रहा है उन पर चर्चा और उसके परिमार्जन की मांग करना कैसे न्यायोचित नहीं है? क्या यह सत्य नहीं कि 800 वर्षों के मुस्लिम शासन में हिंदुओं का आर्थिक और सामाजिक शोषण हुआ और उनके मान-बिंदुओं को चुन-चुनकर ध्वस्त किया गया? पुर्तगाली शासन में गोवा और ब्रितानी शासन में शेष भारत में हिंदुओं से भेदभाव और मजहबी कारणों से उनके उत्पीड़न का भी लंबा इतिहास है। आज भी भारत के अधिकांश महानगरों में सबसे महंगा और विशाल भूखंड अंग्रेज-पुर्तगाली शासन की कृपा से गिरजाघरों के ही अधीन है। क्या इन सभी पर बहस नहीं हो सकती? महिला सशक्तीकरण का समर्थन सभ्य समाज सहित स्वघोषित सेक्युलरिस्ट करते हैं, किंतु जब बात अल्पसंख्यक विशेषकर मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की आती है तो वे तीन तलाक जैसी रूढ़ कुरीतियों को सही मानते हैं और मजहब में हस्तक्षेप व धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में हनन का हवाला देकर सुधार के प्रयासों की निंदा करते हैं। स्वतंत्र भारत में धर्म के नाम पर वोटबैंक सुनिश्चित करने की परंपरा स्थापित करने वालों में देश के पहले प्रधानमंत्री पं. नेहरू की भी भूमिका रही है। 1950 के दशक में उन्होंने हिंदू कोड बिल को तो संसद में पारित करवा लिया, किंतु जब प्रश्न मुसलमानों में सामाजिक सुधार का आया तो उन्हें उनके मजहबी अधिकारों के साथ छोड़ दिया। वर्ष 1985 के शाह बानो मामले में भी वोटबैंक के लिए तत्कालीन राजीव गांधी सरकार की तत्परता किसी से छिपी नहीं है।
आज छद्म-पंथनिरपेक्षकों का सेक्युलरवाद केवल मुस्लिम वोट बैंक तक ही सीमित है। इस पृष्ठभूमि में कोई आश्चर्य नहीं होता, जब आतंकियों और कट्टरपंथियों से सहानुभूति और इस्लाम में व्याप्त महिला विरोधी रीति-रिवाजों का समर्थन पंथनिरपेक्षकों के लिए सेक्युलरवाद बन जाता है और बहुसंख्यकों के हितों की चर्चा सांप्रदायिक ठहरा दी जाती है। आशा है कि आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से पूर्व सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय वोट बैंक की राजनीति, जो कि देश के विकास में बड़ा अवरोधक है, उससे मुक्ति पाने का मार्ग प्रशस्त होगा। प्रश्न है कि क्या ऐतिहासिक अन्याय पर बहस होनी चाहिए या नहीं? यदि होनी चाहिए तो क्या वह केवल चयनात्मक रूप से होनी चाहिए?
[ लेखक बलबीर पुंज, राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं ]