लखनऊ, सद्गुरु शरण। दिल्ली विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद आम आदमी पार्टी का ‘हाइ जोश’ महसूस किया जा सकता है। जब किसी राजनीतिक दल का आत्मविश्वास ‘आप’ की तरह आसमान छूने लगे तो स्वाभाविक रूप से उसकी महत्वाकांक्षाओं को पंख लगने लगते हैं। केजरीवाल और उनकी पार्टी अपवाद नहीं हैं। दिल्ली फतह करते ही उन्होंने सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश का लक्ष्य साधा, जहां करीब दो वर्ष बाद विधानसभा चुनाव संभावित हैं।

सूबे की सियासत समझने वाले मानते हैं कि आम आदमी पार्टी यूपी की चुनावी राजनीति में अपनी भूमिका की जो भी हद निर्धारित करे, उसकी मौजूदगी से अगले विधानसभा चुनाव की रोचकता-रोमांच में उछाल जरूर आएगा। पार्टी ने यूपी में सदस्यता अभियान चलाने और 2022 विधानसभा चुनाव में शिरकत करने की घोषणा की है। पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह का लखनऊ में रोडशो और कार्यकर्ता सम्मेलन करना पार्टी के रोडमैप का स्पष्ट संकेत देता है।

आम आदमी पार्टी की सक्रियता से सभी दलों, खासकर विपक्षी दलों सपा और बसपा के कान खड़े होना स्वाभाविक है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप और कांग्रेस की ट्यूनिंग और इसका प्रभाव सामने आ चुका है। आश्चर्य नहीं कि यूपी में भी दोनों पार्टियां किसी घोषित या अघोषित रणनीति के साथ मैदान में दिखें। 2019 लोकसभा चुनाव में गठबंधन करते वक्त सपा और बसपा ने जिस तरह कांग्रेस का तिरस्कार किया था, उसे राहुल-प्रियंका भूले नहीं होंगे।

ऐसे में 2022 में आप फैक्टर के जरिये घात-प्रतिघात भी देखने को मिल सकते हैं। जाहिर है कि आप की सक्रियता के समानांतर यूपी की सियासत में चौंकाने वाले समीकरण एवं बदलाव दिख सकते हैं, यद्यपि इस रोमांच का साक्षी बनने के लिए अभी काफी इंतजार करना पड़ेगा। यदि संभावना के अनुरूप सपा और बसपा अलग-अलग चुनाव लड़े तो अरसे बाद यूपी की चुनावी राजनीति में ‘आप फैक्टर’ से उपजा मजबूत चौथा कोण भी दिखेगा। चूंकि यह कोण विपक्षी पाले में होगा, इसलिए सपा और बसपा को नुकसान होना तय है, यद्यपि भाजपा को भी बेपरवाह नहीं रहना चाहिए।

दिल्ली में तीसरी बार सरकार बनने पर केजरीवाल को एक बार फिर वैकल्पिक राजनीति का चेहरा कहा जाने लगा है। वैसे भी उनकी झोली में मतदाताओं के लिए ‘फ्री वाले’ इतने सारे उपहार हैं जो किसी का भी मन डांवाडोल कर सकते हैं। बेशक दिल्ली और यूपी के हालात में काफी फर्क है, पर जो ‘अस्त्र’ दिल्ली की जंग में कारगर साबित हो चुका, उसे यूपी में पूरी तरह खारिज करने के बजाय समय रहते उसकी बढ़िया काट तलाश लेना समझदारी होगी।

योगी सरकार के बजट ने चौंकाया : अधिकतर लोग, खासकर विपक्षी नेता यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि यूपी का वर्ष 2020-21 का बजट भगवा छटा बिखेरेगा, पर बजट में बुनियादी ढांचा, शिक्षा, चिकित्सा, कृषि और युवाओं के लिए तमाम प्रावधान देखकर ऐसे लोग चौंक गए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मूल रूप से बेशक संत हैं। भगवा वस्त्र धारण करते हैं। संत की तरह गाय, गंगा और सभी सनातन प्रतीकों के प्रति गहरी श्रद्धा भी रखते हैं, पर मुख्यमंत्री की भूमिका निभाते हुए वह व्यापक सरोकारों के प्रति संवेदनशील दिखते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मुहिम यूपी की राजनीति में दशकों बाद ताजा हवा जैसा अहसास दिला रही है।

इस मुहिम की खासियत यह है कि इसमें आइएएस-आइपीएस और विभागाध्यक्ष स्तर के बड़े अधिकारियों को भी दंडित किया जा रहा है। अपराध और कानून व्यवस्था के मोर्चे पर उनकी सख्ती के सब कायल हैं। नकलमुक्त परीक्षा कराने में भी उनकी प्रेरणा महत्वपूर्ण फैक्टर मानी जा रही। इसके बावजूद दो साल बाद विधानसभा चुनाव से पहले योगी को कई अन्य मोर्चे दुरुस्त करने होंगे। उन्होंने बजट के जरिये अपनी प्राथमिकताओं का संकेत दे दिया है। इस बजट ने विपक्ष को बेशक निराश किया होगा, यद्यपि आम लोग खुश हैं। भाजपा और अपने निजी सांस्कृतिक एजेंडे के प्रति पूरी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए, बजट के जरिये एक कुशल राजनेता जैसी छवि पेश करना योगी की बड़ी सफलता है। उनके पास अगले चुनाव से पहले अब भी दो साल हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि उनकी सेना मजबूती से चुनाव में उतरेगी।

मेनका की सक्रियता : सुल्तानपुर की सांसद मेनका गांधी की सक्रियता भाजपा के तमाम अन्य सांसदों के लिए चुनौती मानी जा सकती है। दरअसल सीट बदलकर निर्वाचित होने के बाद से ही मेनका नियमित अंतराल पर अपने संसदीय क्षेत्र आती रहती हैं और वहां दो-तीन दिन रुककर आम लोगों से खूब मिलती-जुलती हैं। संयोग है कि बगल की सीट अमेठी की सांसद स्मृति ईरानी भी केंद्रीय मंत्री के रूप में व्यस्तता के बावजूद जल्दी-जल्दी अमेठी आती रहती हैं। भाजपा की इन दो महिलाओं की अपने संसदीय क्षेत्र के प्रति संवेदनशीलता से सभी पार्टियों के वे सांसद सबक सीख सकते हैं जो अपने मतदाताओं की उपेक्षा करते हैं। विपक्ष के एक बड़े नेता के संसदीय क्षेत्र में तो मतदाताओं ने गुमशुदगी के पोस्टर तक लगवा दिए हैं।

[स्थानीय संपादक, लखनऊ]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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