विद्या का सामान्य अर्थ है-ज्ञान, शिक्षा और अवगम। महर्षि दयानंद सरस्वती के अनुसार जिससे पदार्थो के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान हो उसे विद्या कहते हैं। अविद्या का अर्थ पारिभाषिक और यौगिक दो प्रकार से किया जा सकता है। दर्शनों में प्राय: पारिभाषिक अर्थ 'अज्ञान' या मिथ्याज्ञान लिया जाता है। 'अविद्या' का यौगिक अर्थ है विद्या से भिन्न ज्ञान जो यथार्थ ज्ञान नहीं है। अविद्या का सामान्य रूप से हम अर्थ लेते हैं विद्या का अभाव, परंतु इसका यह अर्थ नहीं है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार 'अदुष्ट विद्या' अर्थात् जो ज्ञान दोषपूर्ण नहीं है, वह विद्या है और 'तद् दुष्टज्ञानम्' अर्थात् दोषपूर्ण ज्ञान अविद्या है। वेद और उपनिषदों में विद्या और अविद्या शब्दों का दर्शन में प्रयुक्त इन शब्दों से भिन्न अर्थ लिया जाता है। मुण्डोकोपनिषद में विद्या के दो भेद किए गए हैं-परा विद्या और अपरा विद्या। इसी उपनिषद में यह भी कहा गया है कि वेद और उसके छह अंग - शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त छंद और ज्योतिष अपरा विद्या हैं। पराविद्या वह है जिससे ब्रह्म को जाना जाता है।

भौतिक जगत के जिस ज्ञान को आजकल विज्ञान कहते हैं उसी को उपनिषद में अपराविद्या के नाम से कहा गया है। अभ्युदय और भौतिकता अविद्या के पर्याय हैं। इसी प्रकार नि:श्रेयस और आध्यात्मिकता विद्या के पर्याय हैं। यजुर्वेद के एक मंत्र में कहा गया है-'विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदो भयंसह। अविद्ययया मृत्युं तीत्र्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥' इस मंत्र में विद्या का अर्थ वेद से प्राप्त ज्ञान से शुद्ध कर्म और उपासना करना है। जो मनुष्य विद्या और अविद्या के सच्चे स्वरूप को साथ-साथ जान लेता है और उसी के अनुसार कर्म भी करता है वह कर्म और उपासना द्वारा यथार्थ ज्ञान से मोक्ष प्राप्त कर लेता है। यहां पर अविद्या ऐसी है जो विद्या के साथ मिलकर साधक के लिए हितकारी बन जाती है। अविद्या और विद्या, दोनों का ही ज्ञान कर लेना मोक्ष मार्ग का प्रथम सोपान है। यदि हम सभी इसे भलीभांति समझ लें तो हमारा जीवन सही मायने में सुखमय हो जाए।

[कृष्णकांत वैदिक]

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