नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। वर्ष 2020 में लॉकडाउन और मानसून के प्रभाव से जहां 10 माह अपेक्षाकृत बेहतर रहे वहीं पराली के धुएं ने नवंबर को साल का सबसे प्रदूषित महीना बना दिया। दिल्ली में पीएम 2.5 का औसत स्तर पिछले साल की तुलना में काफी कम रहा, लेकिन नवंबर बेहद खराब रहा। पराली के साथ-साथ नवंबर में वाहनों एवं औद्योगिक इकाइयों का प्रदूषण संयुक्त रूप से राजधानी वासियों के लिए जानलेवा बना गया। इसी तरह एनसीआर के शहरों में गुरुग्राम, फरीदाबाद, नोएडा और गाजियाबाद में भी पीएम 2.5 के सालाना औसत स्तर में तो गिरावट आई, लेकिन सर्दियों के दौरान प्रदूषण उसी स्तर पर रहा, जैसा एयरलॉक के दौरान रहता है। इस साल के 11 महीनों में दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण स्तर पर सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरनमेंट (सीएसई) ने अध्ययन कर एक रिपोर्ट तैयार की है।

इस रिपोर्ट से आंकड़ों के आधार पर कई नई चीजें पता चलती हैं। इस अध्ययन में पाया गया है कि लंबे लॉकडाउन के दौरान वायु प्रदूषण न्यूनतम पर पहुंचा, लेकिन नवंबर में जाड़े का मौसम शुरू होते ही इस स्तर को कायम नहीं रखा जा सका। वर्ष भर का सामान्य प्रदूषण नवंबर में गंभीर स्तर तक पहुंच गया। दरअसल, इस साल पराली जलाने के मामले 10 अक्टूबर से ही सामने आने लगे थे। इस साल छह दिन पराली का प्रदूषण 20 से 30 फीसद रहा जबकि पिछले साल यह केवल दो दिन था।

इस बार 16 दिन पराली का प्रदूषण 10 से 20 फीसद था, जबकि 2019 में ऐसा केवल एक दिन था। 23 दिन पराली का प्रदूषण 10 फीसद से कम रहा। दीवाली के दिन 14 नवंबर को यह 32 फीसद दर्ज हुआ। यही वजह रही कि पीएम 2.5 और पीएम 10 के स्तर में पूरे वर्ष की तुलना में नवंबर में 70 फीसद की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई।

इस अध्ययन के अनुसार वर्ष 2019 में नवंबर के अंत तक राजधानी में दो बार स्मॉग छाया, जिसके विपरीत वर्ष 2020 में नवंबर के शुरू में ही सात से दस तारीख के बीच लगातार स्मॉग छाया रहा। दीवाली के दिन पटाखों और पराली के धुएं के संयुक्त प्रभाव से वायु प्रदूषण काफी बढ़ा लेकिन स्मॉग नहीं छाया, क्योंकि दीवाली के अगले दिन वर्षा के कारण प्रदूषण काफी कम हो गया। दीवाली के दिन पीएम 2.5 का स्तर 404 तक पहुंचा लेकिन बारिश हो जाने से अगले दिन घटकर 308 पहुंच गया। पिछले वर्षों में दीवाली के अगले दिन प्रदूषण स्तर बिलकुल कम नहीं होता था, कभी कभी दीवाली के अगले दिन प्रदूषण स्तर और बढ़ जाता था। 

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Edited By: JP Yadav