'संपत्ति के अधिकार से नागरिकों को अवैध रूप से वंचित नहीं कर सकती सरकार', हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है लेकिन अनुच्छेद-300ए के तहत संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने माना कि सरकार नागरिकों को संपत्ति से अवैध रूप से वंचित नहीं कर सकती। याचिकाकर्ता एचके सरीन की संपत्ति पर सरकार का कब्जा अवैध पाया गया और सरकार को ब्याज सहित 1.76 करोड़ रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया गया।

विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने आपातकाल के दौरान कब्जे में ली गई एक संपत्ति से जुड़े मामले पर अहम निर्णय पारित किया है। न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने माना कि भले ही संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन संविधान के अनुच्छेद-300 ए के तहत एक संवैधानिक और कानूनी अधिकार है।
अदालत ने कहा कि एक संवैधानिक प्राधिकरण होने के कारण राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वह संपत्ति के अधिकार सहित अपने नागरिकों के नागरिक अधिकारों का उल्लंघन करने के बजाय उसकी रक्षा करे।
संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300ए के तहत है अधिकार: हाईकोर्ट
पीठ ने कहा कि उक्त अनुच्छेद-300ए में कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को कानून के अधिकार के अलावा उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। इसमें यह अनिवार्य है कि संपत्ति से किसी भी तरह से वंचित करना न्यायसंगत तरीके से किया जाना चाहिए।
अदालत ने उक्त टिप्पणी करते हुए माना कि याचिकाकर्ता स्वर्गीय एचके सरीन के स्वामित्व वाले भवन पर केंद्र सरकार का कब्जे अवैध है। यह याचिका एचके सरीन के दो बेटों राजीव सरीन, दीपक सरीन व स्वर्गीय बेटी राधिका सरीन के कानूनी उत्तराधिकारी वीरा सरीन ने दायर की थी।
केस अंसल भवन स्थित फ्लैट को गलत तरीके से जब्त करने से जुड़ा
फ्लैट को गलत तरीके से जब्त करने से उत्पन्न हुआ था, जो कि आपातकाल के निरस्त निरोध आदेश पर आधारित था। याचिका के अनुसार मामला 1975 में आपातकाल के दौरान सरीन के कस्तूरबा गांधी मार्ग पर अंसल भवन स्थित फ्लैट को गलत तरीके से जब्त करने से जुड़ा है। विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी गतिविधियों की रोकथाम अधिनियम-1974 के तहत उनके खिलाफ प्रिवेंटिव डिटेंसन आदेश जारी किया गया था। आपातकाल के बाद आदेश वापस ले लिया गया था।
वे मुकदमे वाली संपत्ति के वैध और कानूनी मालिक: याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि वे मुकदमे वाली संपत्ति के वैध और कानूनी मालिक हैं और उनके मालिकाना अधिकारों का उल्लंघन” किया गया, जो 1977 में आपातकाल की घोषणा की अवधि के दौरान शुरू हुआ था। हालांकि, आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के अधीन संपदा निदेशालय ने दावा किया कि मुकदमे वाली संपत्ति उन्हें पट्टे पर दी गई थी, लेकिन बाद में 1998 के आदेश द्वारा केंद्र सरकार को जब्त कर ली गई थी।
हालांकि, अदालत ने 1999 से 2020 तक संपत्ति पर कब्जे को गैरकानूनी माना और वादी के मध्यवर्ती लाभ के दावे को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही तत्कालीन बाजार दरों के आधार पर केंद्र सरकार को ब्याज सहित 1.76 करोड़ रुपये से अधिक का याचिकाकर्ताओं को भुगतान करने का आदेश दिया।
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