नई दिल्ली [निहाल सिंह]। कूड़े के पहाड़ राजधानी की सुंदरता को धूमिल तो कर ही रहे हैं, साथ ही हवा-पानी को दूषित कर पर्यावरण के लिए भी खतरनाक साबित हो रहे हैं। दिल्ली में कांच के कबाड़ भी लोगों के लिए सिरदर्द पैदा करते के साथ ही पर्यावरण का नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसे में लोगों को इस समस्या से निजात दिलाने के लिए 18 वर्षीय उदित सिंघल (Udit Singhal) ने कांच से रेत बनाने की मुहिम चलाकर मिसाल पेश की है। ब्रिटिश स्कूल चाणक्य पुरी से स्कूली शिक्षा पूरी करने वाले उदित के कार्य को सराहते हुए संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें विश्व के 17 युवा प्रणेताओं की सूची में शामिल किया है। दो साल पहले उदित ने घरेलू कांच के कचरे को निस्तारण करने के लिए लोगों की जागरूक करने की मुहिम शुरू की थी। मुहिम को उन्होंने तेजी से आगे बढ़ाया और 65 लोगों की मदद से अब तक आठ हजार बोतलों को करीब 5 टन रेत में तब्दील कर चुके हैं।

संस्था बनाकर शुरू किया अभियान

संयुक्त राष्ट्र से सराहे जाने से उत्साहित उदित बताते हैं कि आमतौर पर कांच की बोतलें कबाड़ी ही घर से ले जाता था। इसके बाद इन बोतलों को री-साइकिल किया जाता था। प्रदूषण के चलते री-साइकिल प्लांट दिल्ली से बाहर कर दिए गए, जिसके बाद बोतलों की री-साइकिलिंग महंगी हो गई। उन्होंने देखा कि बोतलें लैंडफिल साइट पर फेंकी जाती हैं। इन बोतलों के निस्तारण के उद्देश्य से दो साल पहले उन्होंने इंटरनेट पर अध्ययन किया तो पाया कि कांच से रेत बनाई जा सकती है। इसके बाद उन्होंने पिता की मदद से कांच को रेत में बदलने वाली न्यूजीलैंड से साढ़े तीन लाख रुपये की मशीन मंगाई। उदित बताते हैं कि 'ग्लास-टू-सैंड' नाम से संस्था बनाकर उन्होंने दिल्ली में अभियान शुरू किया।

अब लंदन में पढ़ाई करेंगे उदित

शॉपिंग साइट्स पर बेच रहे कांच की रेत उदित ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स पर कांच की रेत बेच रहे हैं। इससे जो भी राशि आती है वह इसका उपयोग इसी कार्य को बढ़ाने में करते हैं। वह कुरियर या वालंटियर्स के जरिये बोलतों को एकत्रित करके रेत बनाते हैं। उदित अगले सप्ताह लंदन में पढ़ाई करने जा रहे हैं। उदित बताते हैं कि अक्सर देखने में आया है कि कुछ जालसाज पुरानी बोतलों में नकली माल भरकर बाजार में फिर से बेच देते हैं। ऐसे में बोतलें अगर रेत में तब्दील हो जाएंगी तो इन बोतलों में पुराना या घटिया माल भरकर लोग नहीं बेच सकेंगे।

ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण में काम आ सकती है रेत

दक्षिण भारत में ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण के लिए कांच से बनी रेत का उपयोग किया जा सकता है। इन इमारतों को सीमेंट से संरक्षित नहीं किया जा सकता है। ऐसे में कांच से बनी रेत बहुत मजबूत साबित हो सकती है। इसके लिए फिलहाल सरकारी संस्था द्वारा परीक्षण किया जा रहा है।

Coronavirus: निश्चिंत रहें पूरी तरह सुरक्षित है आपका अखबार, पढ़ें- विशेषज्ञों की राय व देखें- वीडियो

इंडियन टी20 लीग

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस