शरणार्थी कैंप से बॉलीवुड तक का सफर, जानिए मनोज कुमार ने कैसे किया फिल्मी दुनिया पर राज
मनोज कुमार का सफर एक शरणार्थी कैंप से शुरू होकर बॉलीवुड के शिखर तक पहुंचा। हिंदू कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने वाले मनोज कुमार ने अपने अभिनय और देशभक्ति से लाखों लोगों का दिल जीता। हिंदू कॉलेज के प्रोफेसरों ने बताया कि मनोज कुमार पढ़ाई के साथ-साथ अभिनय कविता और देशभक्ति के रंगों में डूबे रहते थे।जानिए उनके संघर्ष और सफलता की कहानी।

शशि ठाकुर, नई दिल्ली। दिल्ली शहर जो इतिहास से लेकर भविष्य तक के किस्से अपनी सड़कों पर समेटे चलता है। इसी शहर में एक शरणार्थी कैंप से निकलकर एक किशोर मन में अपने सपनों की गठरी लिए घूमता था। विजय नगर में रहते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कालेज से उसी किशोर ने सपनों की उड़ान भरी।
कॉलेज की एक पुरानी इमारत की सीढ़ियों पर बैठने वाला यह दुबला-पतला लड़का, जिसकी आंखों में कुछ करने का जज्बा था, वो लड़का हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी था, जिसने बाद में फिल्मी दुनिया पर अभिनेता मनोज कुमार के नाम से राज किया।
इतने कला में माहिर थे मनोज
हिंदू कॉलेज के प्रोफेसरों ने बताया कि मनोज कुमार पढ़ाई के साथ-साथ अभिनय, कविता और देशभक्ति के रंगों में डूबे रहते थे। जब साथी छात्र क्रिकेट या चाय की चर्चा में मगन होते, उस समय मनोज चुपचाप लाइब्रेरी के किसी कोने में बैठकर भगत सिंह या गांधी पर कुछ पढ़ रहे होते या फिर खुद कोई संवाद लिख रहे होते।
प्रोफेसर रतन लाल बताते हैं कि उनके हावभाव, उसकी आवाज और उनके शब्दों में कुछ ऐसा असर था कि एक बार सुनने के बाद भुला नहीं जा सकता था। हिंदू कॉलेज के एनुअल डे पर जब उन्होंने पहली बार मंच पर मैं भारत हूं, कविता सुनाई थी।
उस समय पूरा हाल कुछ देर के लिए शांत हो गया था। न कोई ताली, न कोई शोर, बस एक ठहराव जैसे लोग उसकी आंखों में बसे भारत को देख रहे हों। उस दिन किसी ने नहीं सोचा था कि यही लड़का एक दिन सिनेमा के परदे पर भारत बन जाएगा।
महज 10 वर्ष की आयु में भारत आए थे मनोज
उनके जूनियर रहे छात्रों ने बताया कि अभिनेता मनोज कुमार अक्सर कहा करते थे कि मैंने अभिनय दिल्ली की गलियों से सीखा और आत्मा हिंदू कालेज से पाई है। कॉलेज से निकलकर उन्होंने मंच बदला, लेकिन भावनाएं वही रहीं। आजादी के बाद अभिनेता मनोज कुमार अपने परिवार के साथ महज 10 वर्ष की आयु में पाकिस्तान से भारत आए थे।
शुरुआत में उनका परिवार किंग्सवे कैंप में शरणार्थी कैंप में रहता था। बाद में परिवार विजय नगर और फिर राजेंद्र नगर में भी रहा, जब उन्होंने हिंदू कॉलेज में दाखिला लिया, तब उस समय यह कॉलेज कश्मीरी गेट पर हुआ करता था। वर्ष 1953 में हिंदू कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी कैंपस में शिफ्ट हो गया। अब वर्तमान में उस स्थान पर एमसीडी का दफ्तर है।
संघर्ष को मुस्कान में बदलना सीखे मनोज कुमार
पुरानी दिल्ली के मकानों और नई दिल्ली की इमारतों के बीच मनोज कुमार ने सीखा कि कैसे संघर्ष को मुस्कान में बदलना है। मनोज कुमार के करीबी रहे सामाजिक कार्यकर्ता पद्मश्री जितेंद्र सिंह शंटी ने बताया कि मनोज कुमार को जब भी मौका मिलता था। वह दिल्ली में कार्यक्रमों में जरूर पहुंचते थे। यहां पुराने मित्रों से मिलना जुलना होता था।
2000 में फिक्की ऑडिटोरियम में जब भगत सिंह की याद में श्रद्धांजलि सभा हुई तो उनके बुलावे पर वह तुरंत तैयार हो गए और मुंबई से दिल्ली पहुंच गए। वह कहते थे कि शरीर भले मुंबई में है, लेकिन आत्मा दिल्ली में रहती है।
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