नई दिल्ली [नेमिष हेमंत]। दरीबां कला की गली में जैसे ही एक अनजान शख्स के तौर पर पहुंचेंगे तो आप पहले पहल हैरत में पड़ जाएंगे कि यहां कैसे बेशकीमती, बेहद जुदा आभूषण सजे हैं। जैसे-जैसे आपके कदम बढ़ते जाएंगे गली के दोनों ओर चमचमाते शीशों से झांकते आभूषण अपने सौंदर्य से आपका मन मोह लेंगे। आप कभी जेब की सोचेंगे तो कभी मन को थामेंगे, इसी उधेड़बुन में आप दो-चार दुकानों पर तो ठहर कर निहारेंगे ही।

मुगलकालीन आभूषण के इस बाजार में आज भी 700 से अधिक ज्वैलर्स की दुकाने हैं। सदियां बीत गईं, लेकिन यहां के आभूषण और डिजाइन आज भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं। विभिन्न राज्यों से आए कारीगरों की कारीगरी ऐसी होती है कि हर मन को रिझाती है। खासकर जड़ाऊ सादाकारी, कुंदन पोलकी व हीरे के जेवरात दरीबा कलां की पहचान हैं। भारत के प्राचीन ज्वैलरी बाजारों में से एक दरीबा का ब्रांड इतना लोकप्रिय है कि विदेश से खरीदार यहां आते हैं। सोने व हीरे के साथ ही चांदी की आकर्षक ज्वैलरी की मांग अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में है।

 

महारानियां बग्घी पर आती थीं जेवर खरीदने

मुगल शासन ने जब आगरा से दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया तब चांदनी चौक स्थित यह बाजार भी अस्तित्व में आया। सन् 1650 में बसे इस बाजार में मुगल बादशाह और महारानियों के लिए आभूषण बनाए जाते थे। शाहजहां की बेटी रोशनआरा और जहांआरा तो यहां के आभूषणों पर इस कदर फिदा थीं कि लालकिला से बग्घी पर बैठ खुद इस बाजार में आती थीं और अपने आभूषण पसंद किया करती थीं। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर तक यहां के आभूषण लालकिला की चमक बढ़ाते रहे। चांदनी चौक के सेठ-साहूकार के घरों में भी यहां के जेवरातों की हनक है। आज भी यहां से आभूषणों पर मुगलई कलाकारी की झलक साफ तौर पर देखने को मिल जाती है। नए और पुराने डिजाइन के तालमेल से तैयार यहां के आभूषण कहीं और देखने को नहीं मिलेंगे। यहां कई दुकानें 250 साल से भी अधिक पुरानी हैं और अपने डिजाइन और शुद्धता से आज भी ग्राहकों के दिलों में जगह बनाए हुए है।

 खास है जड़ाऊ सादाकारी

जड़ाऊ सादाकारी आभूषण मुगल राजाओं और महारानियों को खास पसंद थे। दरअसल लालकिला व आगरा किला की दीवारों पर जिस तरह के बेल बूटे अंकित हैं, जड़ाऊ सादाकारी में भी उसी प्रकार के बेल बूटे उकेरे जाते हैं। सोने से तैयार इस हार में रूबी  व पन्ना जड़ा जाता है। हालांकि अब इस हार का वजन थोड़ा हल्का हो गया है, लेकिन महिलाओं के बीच इस हार की लोकप्रियता आज भी उतनी ही है। इस हार को तैयार करने में कम से कम 15 दिन का समय लग जाता है।

बन चुका है ब्रांड

वर्ष 1752 की रतन चंद ज्वालामल की दुकान इस बाजार में सबसे पुरानी है। इसे रतन चंद ने शुरू किया था। अब इसे उनकी सातवीं पीढ़ी के तरुण गुप्ता व आठवीं पीढ़ी के उनके बेटे कार्तिक गुप्ता संभाल रहे हैं। वे बताते हैं कि यहां आभूषणों के कुछ डिजाइन ऐसे हैं, जो यहीं के हैं और उसे एक ब्रांड के तौर पर देखा जा सकता है। क्योंकि इसमें मुगलई दस्तकारी की झलक है। पहले तो हाथ से ही सारे गहने तैयार होते थे। लेकिन अब मशीन का भी उपयोग होने लगा है।

परवेज मुर्शरफ के घर में यहां के इत्र की खुशबू

सिर्फ आभूषण ही नहीं, यहां खाने-पीने से लेकर स्लेट-पेंसिल और इत्र की भी दुकानें खासा मशहूर हैं। गुलाबमल जौहरीमल के इत्र की दुकान करीब 200 साल से अधिक पुरानी है। इसके इत्र की खुशबू पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ के घर तक पहुंच चुकी है। वर्ष 2009 में परवेज मुशर्रफ जब दिल्ली आए थे तब अपनी मां के लिए इस दुकान से बारिश में मिट्टी से आने वाली सोंधी खुशबू वाली इत्र लेकर गए थे।

पीढ़ियों से चला आ रहा है नाता

यहां दुकानदारों और खरीदारों के बीच पीढिय़ों से नाता चला आ रहा है। यहां के ग्राहक ऐसे हैं जो पीढिय़ों से इस बाजार से ही आभूषणों की खरीदारी करते आ रहे हैं। यहां के आभूषणों पर एक विश्वास और डिजाइन ने ग्राहकों और दुकानदारों के बीच एक रिश्ता कायम कर दिया है। दरीबा कलां के पुराने ग्राहकों में सिर्फ दिल्ली ही नहीं, दूसरे राज्य और विदेश के लोग भी शामिल हैं।

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Posted By: JP Yadav

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