नई दिल्ली, ऑनलाइन डेस्क। तीनों कृषि कानूनों को रद कराने की मांग को लेकर चल रहे किसान आंदोलन की धुरी बन चुके भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत की चर्चा देशभर में है। पिछले  तकरीबन एक महीने के दौरान राकेश टिकैत अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश और हरियाणा समेत आधा दर्जन राज्यों में हुई किसानों की महापंचायत में शामिल हुए हैं। इस दौरान मुख्य वक्ता के तौर पर कई बार केंद्र सरकार तक को कृषि कानूनों के मुद्दे पर ललकार चुके हैं। यह बात तो सभी जानते हैं कि राकेश टिकैत दिल्ली पुलिस में बतौर कांस्टेबल भर्ती हुए और 6-7 साल तक जनता की सेवा की। वहीं, यह बात बेहद कम लोग जानते होंगे कि उन्होंने बतौर कांस्टेबल न तो पुलिस की खाकी वर्दी पहनी और न ही सड़कों पर डंडे फटकारे। हम बताते हैं इसके पीछे की असली वजह। राकेश टिकैत खुद बताते हैं- 'मैं अपने गांव सिसौली से दिल्ली पुलिस में भर्ती होने आया। हर मानदंड पर खरा उतरने के बाद दिल्ली पुलिस में बतौर कांस्टेबल भर्ती हो गया। इसके बाद मैं बम स्क्वायट टीम में शामिल हो गया। इसके बाद न तो मैंने दिल्ली पुलिस की खाकी वर्दी पहनी और न ही सड़कों पर डंडे फटकारे।' राकेश टिकैत का कहना है- 'मेरी तैनाती एयरपोर्ट तक पर रही, इस दौरान दिल्ली पुलिस की वर्दी पहनने का मौका ही नहीं मिला।'

1992 में अचानक छोड़ दी दिल्ली पुलिस की नौकरी

मुजफ्फरनगर के सिसौली गांव में 4 जून को जन्में राकेश टिकैत ने मेरठ यूनिवर्सिटी से एमए किया। इसके बाद पढ़ाई आगे जारी रखते हुए एलएलबी भी की। 1985 में खुली भर्ती के दौरान वह दिल्ली पुलिस में बतौर कांस्टेबल चुन लिए गए। ट्रेनिंग के बाद वह 1992 तक दिल्ली पुलिस में अपनी सेवाएं देते रहे, लेकिन 1992 हालत ऐसे बन गए कि नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा। हुआ यूं कि 1993-94 में पिता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में दिल्ली में बोट पर बड़ा किसान आंदोलन चल रहा था। इस दौरान हालात ऐसे बने कि राकेश ने पुलिस की नौकरी छोड़ दी और किसानों के साथ आंदोलन की राह पकड़ ली। बताया जाता है कि दिल्ली पुलिस के आला अधिकारियों ने राकेश टिकैत से कहा कि वे अपने पिता महेंद्र सिंह टिकैत को आंदोलन खत्म करने के लिए मनाएं। इस बीच राकेश टिकैत ने अपने पिता के साथ खुलकर आते हुए दिल्ली पुलिस के कांस्टेबल पद से इस्तीफा दे दिया।

पिता से सीखी किसान राजनीति

राकेश टिकैत देश के जाने-माने किसान नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे हैं। वैसे तो महेंद्र सिंह टिकैत के निधन के बाद बड़े बेटे नरेश टिकैत ही भारतीय किसान यूनियन की कमान संभाल रहे हैं, लेकिन जलवा कायम है राकेश टिकैत का। नेतृत्व क्षमता का ही कमाल है कि राकेश के बड़े भाई नरेश वैसे तो भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष हैं लेकिन असली कमान राकेश के हाथ है। 

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जानिये- राकेश टिकैत के बारे में कुछ और बातें

  • किसानों के हितों के लिए समर्पित राकेश टिकैत एक-दो बार नहीं, बल्कि 44 बार जेल जा चुके हैं।
  • पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ चले आंदोलन के लिए उन्हें 39 दिन तक जेल में रहना पड़ा।
  • इसी तरह गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाने के लिए दिल्ली में प्रदर्शन किया तो इन्हें गिरफ्तारी के बाद जेल तक जाना पड़ा। 
  • बाजरे के समर्थन मूल्य के लिए आंदोलन करने के दौरान राकेश टिकैत को जयपुर जेल भेज दिया गया।

चुनाव लड़ा पर जीत से बहुत दूर रहे राकेश टिकैत

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों के नेता राकेश टिकैत 2 बार चुनाव भी लड़ चुके हैं, लेकिन राजनीति की पिच पर वह आउट हो गए। राकेश टिकैत ने पहली बार 2007 में मुजफ्फरनगर की खतौली विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में हार मिली, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोक दल ने उन्हें अमरोहा लोकसभा सीट से खड़ा किया, लेकिन यहां भी शिकस्त ही हाथ लगी। खैर वह अब राजनीति को बेहद गंदी चीज करार दे रहे हैं।

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राकेश टिकैत के आंसुओं ने बदली किसान आंदोलन की दशा-दिशा

दरअसल, 26 जनवरी को किसान ट्रैक्टर परेड के दौरान दिल्ली में हिंसा हुई थी। इसके बाद अगले कुछ दिनों के दौरान 2-2 किसान संगठनों ने किसान आंदोलन से हाथ खींच लिया था। यूपी गेट पर किसानों की संख्या घट गई। गाजीपुर बॉर्डर पर हजारों किसानों की संख्या सैकड़ों में सिमट गई। बताया जाता है कि राकेश टिकैत खुद भी आंदोलन खत्म करने का मन बना चुके थे। इस बीच अफवाह उड़ गई कि लोनी के भाजपा विधायक अपने समर्थकों के साथ आए हैं। राकेश टिकैत मीडिया के समक्ष यह बयान देते हुए रो पड़े कि किसानों की पिटवाने की साजिश की गई है। राकेश टिकैत के आंसुओं का कमाल है कि आंदोलन अब उनके इर्द-गिर्द चल रहा है।

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