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    Entrepreneur Yogesh Munjal: उम्मीद की किरण साबित हुआ लाहौर से आने वाली आखिरी ट्रेन

    By Jp YadavEdited By:
    Updated: Sat, 06 Aug 2022 10:08 AM (IST)

    Entrepreneur Yogesh Munjal News योगेश मुंजाल (चेयरमैन व प्रबंध निदेशक मुंजाल शोवा लिमिटेड) ने बताया कि लोग कहते थे कि वे तो नासमझ हैं जो पूरी मेहनत कर ...और पढ़ें

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    Entrepreneur Yogesh Munjal: उम्मीद की किरण साबित हुआ लाहौर से आने वाली आखिरी ट्रेन

    नई दिल्ली [प्रियंका दुबे मेहता]। आज मुंजाल परिवार एक मिसाल के तौर पर देश-विदेश में पहचान रखता है। उम्मीद की किरण उस आखिरी रेलगाड़ी का सहारा न लिया होता तो शायद आज वह न होते जो हैं। रास्ते भर मार-काट के दश्यों के बीच गुजरते स्टेशनों पर बच्चों की आंखें बंद कर दी जातीं लेकिन डर तो सबसे मनों में था। एक ही लक्ष्य कि किसी तरह से उस पार पहुंचा जाए। पूरा परिवार आखिरी ट्रेन पहुंचकर लुधियाना पहुंचा और फिर संघर्षों की लंबी यात्रा के बाद कामियाबी की सीढ़ियां चढ़ते हुए दिल्ली का रुख किया।

    सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने सपनों का आशियाना छोड़कर आए थे

    सत्यानंद के बेटे योगेश मुंजाल (चेयरमैन व प्रबंध निदेशक, मुंजाल शोवा लिमिटेड) ने बताया कि हालातों के घने कोहरे के बीच कैसे उनका परिवार यहां पहुंचा और फिर एक कमरे के मकान में तीन चाचा और पिता का परिवार रहने लगा। पाकिस्तान के ल्यालपुर (अब फैसलाबाद) कमालिया में रह रहे मुंजाल परिवार ने अभी सपनों का नया घर बनवाया ही था कि उसे छोड़कर आना पड़ा।

    मेहनत की स्याही से लिखी सफलता की पटकथा
    योगेश बताते हैं कि जब उनका घर बन रहा था तो वहां के लोग कह रहे थे कि वे तो उनके लिए मकान बना रहे थे। इन लोगों ने सोचा कि ऐसा कुछ नहीं होगा लेकिन अचानक वह भयावह मंजर सामने आ गया जिसमें जान बचाना के अलावा कुछ याद नहीं रहा। उस समय योगेश सात वर्ष के थे। वे सभी दृश्यों को देखते, मन में तमाम आशंकाएं लिए और अनिष्ठ का डर समाए बस माता पिता के साथ चले जा रहे थे। उन्हें लगा सबकुछ खत्म हो गया। अब कुछ नहीं हो सकेगा।

    देखा है हमने मुश्किलों का दौर

    योगेश ने बताया कि बंटवारा होने के पहले उनके पिता ने लाहौर जाकर साइकिल का काम सीख लिया था। लुधियाना साइकिल का पहले से केंद्र था। यहां आकर फिर से काम शुरू करने के बारे में सोचा और साइकिलों के आर्डर लेना, देना और पेमेंट एकत्र करने का काम करने लगे। दिन-रात मेहनत करके एक दुकान ली और उसमें सामान रखने लगे। साइकिलें बनाने लगे लेकिन उसमें कुछ पार्ट किसी और से लेने होते थे, वह समय पर वह पार्ट नहीं देता था। ऐसे में मुश्किल होती थी।

    कभी थे सैकड़ों, आज सिर्फ 5-6 बचे

    पिता जी और चाचा जी को दिक्कत होती थी। फिर उन्होंने सोचा कि यह तो साधारण सा पार्ट ही तो था, क्यों न वे खुद ही इसे बना लें। दुकान पीछे लंबे थी सो वहां हाथ वाली मशीन लगाकर वह पार्ट बनाना शुरू कर दिया। काम बढ़ता गया। उस समय साइकिल बनाना सरकार द्वारा नियंत्रित था। एटलस, हिंद, हरक्यूलिस, रेले जैसी चार कंपनियों को ही सरकार ने अनुमति दी थी, उसके बाद काफी वर्षों तक बंद रहा। इसके बाद 1956 में सरकार ने लगभग सौ लोगों को अनुमति दी। आज उनमें से पांच से छह ही बचे हैं।

    मेहनत और लगन से हुआ संभव

    उस समय 25 प्रतिदिन पचीस साइकिल की परमिशन मिली थी और मेहनत और लगन ही थी कि वर्तमान में 19 हजार साइकिलें प्रतिदिन ही बना रहे हैं। योगेश बताते हैं कि सफलता की कहानी रातोंरात नहीं बनी। खून-पसीने और लगन की स्याही से लिखी गई।

    उन्होंने बताया कि जब लोग सरकारी अनुमति से मिले प्रीमियम का लाभ बिना साइकिल बनाए ही तकरीबन चालीस रुपये का लेते थे, उस समय इनका परिवार साइकिल बनाकर बेंचने पर मात्र दस रुपये का लाभ पा रहा था।

    खैर एक ऐसा वक्त आया जब 1986 में गिनीज बुक रिकार्ड्स में सबसे अधिक साइकिलें बनाने वाली कंपनी बन गई। जापान में होंडा कंपनी के साथ जुड़े और मोटर साइकिल और काइनेटिक होंडा का स्कूटर बनाने लगे।