अपने ही बच्चे का इलाज कराने से कर रहा था इनकार, दिल्ली हाई कोर्ट ने पिता को लगाई फटकार, कहा- उठाना पड़ेगा पूरा खर्च
दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि बच्चे के कल्याण की प्राथमिक जिम्मेदारी पिता की होती है न कि नाना की। अदालत ने बच्चे के इलाज का खर्च माता-पिता के बीच बांटने के पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद् कर दिया। अदालत ने कहा कि पत्नी की आय पर्याप्त नहीं है जबकि पति सक्षम है। पति को बच्चे के इलाज का पूरा खर्च उठाने का आदेश दिया।

विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली : पत्नी को भरण-पाेषण देने से संबंधी आदेश का अनुपालन न करने के साथ ही बच्चे के इलाज का खर्च नहीं उठाने के मामले पर दिल्ली हाई कोर्ट ने अहम आदेश पारित किया है।
पति-पत्नी के बीच बच्चे के इलाज का खर्च बांटने के पारिवारिक अदालत के निर्णय को रद करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि महिला के पिता के बजाय बच्चे के कल्याण की प्राथमिक जिम्मेदारी उसके पिता की है।
अदालत ने कहा कि महिला पूरी तरह से बच्चे की देखभाल कर रही है, जबकि उसकी आय खुद का भरण-पोषण करने के लिए भी पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने कहा- फिजलूखर्ची का जीवन जी रहा है पिता
वहीं, अपीलकर्ता पति के पास पर्याप्त आय है और वह फिजूलखर्ची की जीवन जी रहा है। ऐसे में अपीलकर्ता पति द्वारा बच्चे की सर्जरी और इम्प्लांट का पूरा खर्च वहन न करने का कोई औचित्य नहीं है।
पारिवारिक अदालत के निर्णय के विरुद्ध पति की अपील याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति नवीन चावला व न्यायमूर्ति रेनू भटनागर की पीठ ने यह आदेश दिया।
नाना ने की थी इलाज का खर्च उठाने की पेशकश
पीठ ने कहा कि महिला के पिता ने सर्जरी का खर्च उठाने की पेशकश की होगी, लेकिन अगर अपीलकर्ता पति के पास सर्जरी का खर्च उठाने के साधन न होते, तो बात अलग होती, लेकिन ऐसा नहीं है, क्योंकि बच्चे के कल्याण की प्राथमिक जिम्मेदारी पिता की है।
पत्नी को अंतरिम रखरखाव देने के पारिवारिक अदालत के निर्णय को बरकरार रखते हुए अदालत ने अपीलकर्ता पति को बच्चे के इलाज, सर्जरी और इसके बाद का पूरा खर्च वहन करने का आदेश दिया।
साथ ही पारिवारिक अदालत को निगरानी का भी आदेश दिया। अदालत ने अपीलकर्ता पति को निर्देश दिया कि वह बकाया भरण-पोषण की रकम एरियर के साथ एक महीने के अंदर भुगतान करे। साथ ही तय की गई अंतरिम भरण-पोषण की रकम प्रत्येक माह की 10 तारीख को भुगतान करे।
बच्चे के इलाज में 36.42 लाख रुपये का आ रहा खर्च
पारिवारिक अदालत ने नोट किया था कि बच्चे के इलाज पर 36.42 लाख रुपये का खर्च है। ऐसे में पारिवारिक अदालत ने 21 अप्रैल 2025 को बच्चे के इलाज का खर्च में 75 प्रतिशत अपीलकर्ता पति व 25 प्रति महिला को भुगतने का आदेश दिया था।
हालांकि, इस छूट के साथ शुरुआत में उसे पूरे खर्च का भुगतान करने को कहा गया था कि 25 प्रतिशत रकम बकाया रखरखाव के भत्ते में से एडजेस्ट कर ले। ऐसे में हाई कोर्ट को इस पर निष्कर्ष देना था कि क्या पूरे खर्च का भुगतान पति को करना चाहिए। उक्त निर्देशों के साथ अदालत ने याचिका का निपटारा कर दिया।
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