किडनी ट्रांसप्लांट के बाद नई चुनौती: 43% मरीजों को घेर रही मधुमेह, AIIMS अध्ययन में बड़ा खुलासा
एम्स दिल्ली के एक अध्ययन में सामने आया है कि किडनी प्रत्यारोपण के बाद 43% मरीजों में मधुमेह विकसित हो रहा है। यह स्थिति प्रत्यारोपित किडनी की कार्यक्ष ...और पढ़ें

किडनी प्रत्यारोपण के बाद मधुमेह बना बड़ा खतरा। सांकेतिक तस्वीर
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जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। किडनी प्रत्यारोपण से गंभीर मरीजों को नया जीवन जरूर मिलता है, लेकिन इसके साथ ही मधुमेह की बीमारी नई चुनौती बनकर उनके सामने आ रही है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली में किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि किडनी प्रत्यारोपण के बाद 43 प्रतिशत मरीजों में मधुमेह (डायबिटीज) विकसित हो रही है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मेडिकल पत्रिका वर्ल्ड जर्नल आफ नेफ्रोलाजी (विश्व गुर्दा विज्ञान पत्रिका) में प्रकाशित हुआ है।
नेफ्रोलाजी विभाग ने किया अध्ययन
यह अध्ययन एम्स दिल्ली के नेफ्रोलाजी विभाग (गुर्दा रोग विभाग) की विशेषज्ञ टीम द्वारा किया गया। शोध का उद्देश्य किडनी प्रत्यारोपण के बाद मरीजों में होने वाली दीर्घकालिक स्वास्थ्य जटिलताओं को समझना था।
अध्ययन में कुल 72 मरीजों को शामिल किया गया, जिनमें से 66 मरीजों के आंकड़ों का विस्तृत विश्लेषण किया गया। इन मरीजों की औसत आयु 32.4 वर्ष पाई गई।
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एक वर्ष के भीतर 43 प्रतिशत मरीजों में मधुमेह
अध्ययन के निष्कर्ष बेहद चिंताजनक हैं। शोध के अनुसार, किडनी प्रत्यारोपण के एक वर्ष के भीतर 43 प्रतिशत मरीजों में नई मधुमेह विकसित हुई। खास बात यह है कि इनमें कई ऐसे मरीज भी शामिल थे, जिन्हें प्रत्यारोपण से पहले मधुमेह नहीं थी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति न केवल मरीज के समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि प्रत्यारोपित किडनी की कार्यक्षमता पर भी असर डाल सकती है।
इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं बनीं प्रमुख कारण
एम्स दिल्ली के नेफ्रोलाजी विशेषज्ञों के अनुसार, प्रत्यारोपण के बाद मरीजों को दी जाने वाली इम्यूनोसप्रेसिव दवा (रोग प्रतिरोधक क्षमता को दबाने वाली दवा) शरीर की इंसुलिन पर प्रतिक्रिया को प्रभावित करती हैं। इसके कारण रक्त शर्करा का स्तर बढ़ने लगता है और मधुमेह का खतरा पैदा होता है। इसके अलावा उम्र बढ़ना, वजन बढ़ना, उच्च रक्तचाप और पारिवारिक इतिहास भी मधुमेह के जोखिम को बढ़ाने वाले प्रमुख कारक हैं।
सभी मरीजों में जोखिम समान नहीं
अध्ययन में यह भी पाया गया कि सभी मरीजों में मधुमेह होने का खतरा समान नहीं होता। कुछ मरीजों में प्रत्यारोपण के शुरुआती महीनों में ही रक्त शर्करा बढ़ने लगती है, जबकि कुछ में यह समस्या धीरे-धीरे विकसित होती है। इसी कारण विशेषज्ञों ने नियमित जांच और निरंतर चिकित्सकीय निगरानी को बेहद जरूरी बताया है।
नियमित जांच, संयमित जीवनशैली से बचाव संभव
डाक्टरों के अनुसार, किडनी प्रत्यारोपण के बाद यदि मरीज ब्लड शुगर (रक्त शर्करा) की नियमित जांच कराएं, संतुलित आहार अपनाएं और सक्रिय जीवनशैली रखें, तो मधुमेह को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने प्रत्यारोपण के बाद मजबूत फालोअप प्रणाली (निरंतर चिकित्सकीय देखरेख) लागू करने पर जोर दिया है, ताकि मरीज लंबे समय तक स्वस्थ रह सकें।
इस समाचार में उपयोग किए गए क्रिएटिव ग्राफिक्स को NoteBookLM आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस प्रोग्राम की सहायता से बनाया गया है।

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