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    ट्रैफिक, प्रदूषण और भीड़ से राहत मिलेगी या नहीं? दिल्ली-NCR के विकास प्लान पर बड़ी बहस

    Updated: Fri, 02 Jan 2026 08:32 PM (IST)

    दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते तापमान और प्रदूषण के कारण सतत शहरी विकास की महत्वपूर्ण आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। इसमें परिवहन, आवास, नवीकरणीय ऊर्जा और पर्य ...और पढ़ें

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    दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते तापमान और प्रदूषण के कारण सतत शहरी विकास की महत्वपूर्ण आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। जागरण ग्राफिक्स

    स्मार्ट व्यू- पूरी खबर, कम शब्दों में

    जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। वर्षभर वायु प्रदूषण से जूझने वाले दिल्ली समेत एनसीआर में तापमान भी समय के साथ बढ़ रहा है, ऐसे में इस क्षेत्र में प्रकृति का ख्याल रखते हुए सतत शहरी विकास की आवश्यकता है। परिवहन क्षेत्र में मेट्रो, रैपिड रेल व इलेक्ट्रिक बसों का विस्तार महत्वपूर्ण है तो वहीं निजी वाहनों में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बढ़ाने के साथ ही साइकिल लेन व पैदल चलने के लिए फुटपाथ कीउपयुक्त व्यवस्था पर भी जोर रहे। क्षेत्र में सस्ते मकान तो चाहिए ही, साथ ही इन मकान, फ्लैट या अपार्टमेंट की बिल्डिंग ग्रीन व स्मार्ट होनी चाहिए। 

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    नवीकरणीय ऊर्जा का अधिकतम इस्तेमाल हो। शहर में मिक्स यूज डेवलपमेंट होना चाहिए, ताकि लोगों को अपनी आवश्यकता के लिए दूर न जाना पड़े और यातायात पर बोझ न पड़े। वन, हरियाली व जल संसाधनों का संरक्षण करने के साथ ही नए विकसित किए जाने चाहिए, अर्बन फारेस्ट बनाए जाने चाहिए। गैर-प्रदूषणकारी उद्योग विकसित किए जाने चाहिए।

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    प्रशासन में तकनीक का बेहतर इस्तेमाल, जैसे स्मार्ट ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम इत्यादि का प्रयोग बढ़ाया जाना चाहिए। लेकिन दिल्ली सहित एनसीआर में सतत शहरी विकास की सबसे बड़ी बाधा नीतिगत खामियां रही हैं। ज्यादातर नीतियां हर राज्य की अलग हैं जबकि एनसीआर के लिए एकीकृत नीतियां-योजनाएं होनी चाहिए।

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    अब चाहे प्रदूषण का मामला हो या सार्वजनिक परिवहन का, ट्रैफिक जाम का हो या आपदा प्रबंधन, आवासीय योजनाएं हों अथवा जल निकासी...पूरे क्षेत्र के लिए एकीकृत नीतियां और योजनाएं ही बननी चाहिए, तभी सतत शहरी विकास संभव है। ऐसे में यही उठता है कि आखिर क्षेत्र में सतत शहरी विकास को सरकारी एजेंसियां गंभीरता से क्यों नहीं लेतीं? इसके लिए कौन है जिम्मेदार? एनसीआर में सतत शहरी विकास के लिए क्या किए जाने चाहिए ठोस उपाय। इसी की पड़ताल हमारा आज का मुद्दा है:

    किसी भी शहर के लिए सतत शहरी विकास का भावार्थ बहुत बड़ा हो जाता है। दिल्ली सहित एनसीआर की बात करें तो यहां इसके मायने और बढ़ जाते हैं। देश की राजधानी होने के साथ-साथ जिस तरह से दिल्ली समेत एनसीआर का दायरा बढ़ता जा रहा है। जहां तक इसे अमलीजामा पहनाने की बात है तो यहां यह चुनौतीपूर्ण भी हो जाता है।

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    दिल्ली की बात करें तो एक तरफ जहां दिल्ली का एनडीएमसी इलाका है, जिसे आप कुछ व्यवस्थित कह सकते हैं। मगर आप जब नगर निगम के इलाके में आते हैं तो यहां से सतत विकास बहुत दूर नजर आता है। यहां बहुत सा ऐसा इलाका है जो विकास के मामले में पूरे शहर की छवि पर असर डालता है।

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    दिल्ली के अंदर 100 से अधिक गांवों और उनके आसपास बसी अनधिकृत कालोनियां भी एक बड़ा मुद्दा है। यहां समस्याओं की भरमार है और यहां कालोनियां बढ़ने के साथ साथ समस्याएं भी बढ़ रही हैं। यहां अवैध निर्माण जारी है, निर्माण को लेकर कोई नियम नहीं है। अन्य तरीके की समस्याएं हैं, जिन पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। यमुना खादर क्षेत्र है, वहां के लिए नियम हैं लेकिनपालन नहीं होता, उस पर काम करने की जरूरत है।

    यातायात, पार्किंग और एक्यूआइ यानी प्रदूषण की समस्या दूर करने के लिए बड़े स्तर पर काम करना होगा। प्रदूषण की बात है तो उद्योगों को लेकर ऐसी इकाइयों को चरणबद्ध तरीके से बाहर किया जाए। यह काम ईमानदारी से होना चाहिए और उन्हीं कारखाने को चलने की अनुमति दी जानी चाहिए जो पंजीकृत हैं और सरकार के पास जिनका पूरा ब्यौरा हो। अवैध रूप से कोई भी कारखाना नहीं चलने दिया जाना चाहिए। अगर कोई कारखाना प्रदूषण फैला रहा है तो वह पकड़ में आ सके।

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    नगर निगम और जल बोर्ड सहित सभी एजेंसियों के सक्रिय होने की जरूरत है। सालिड वेस्ट मैनेजमेंट (ठोस अपशिष्ट प्रबंधन) की अगर बात करें तो इस पर काम करना होगा। सालिड वेस्ट मैनेजमेंट वह व्यवस्थित प्रक्रिया है जिसमें मानव गतिविधियों से उत्पन्न बेकार ठोस पदार्थों (कचरे) का संग्रह, उसे ले जाना, पृथक्करण, उपचार, पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) और सुरक्षित निपटान किया जाना है।

    कई जगह इसमें बहुत अच्छा काम हुआ है। लखनऊ में ही कुछ सालों में बड़ा अच्छा काम किया गया है। इंदौर, पुणे के बाद यहां तक कि नोएडा में भी अच्छा काम हो रहा है। दिल्ली ऐसी क्यों नहीं कर सकती है। दिल्ली भी कर सकती है, इसके लिए बहुत गहराई से काम करने की जरूरत है। 

    वर्तमान में शहर के बेहतर तरीके सतत विकास होने की उम्मीद है। क्योंकि दिल्ली में ट्रिपल इंजन की सरकार है यानी केंद्र में और दिल्ली में भाजपा की सरकार है। नगर निगम में भी। सही मायने में जनता ने भी इसी उद्देश्य से भाजपा को जनादेश दिया है कि भाजपा की सरकार होने से दिल्ली में और बेहतर तरीके से कम हो सकेगा।

    -बलविंदर कुमार, पूर्व उपाध्यक्ष, दिल्ली विकास प्राधिकरण ने जैसा वीके शुक्ला को बातचीत में बताया

    नीतिगत खामियों से होगा सतत शहरी विकास

    राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में शहरी पुनर्गठन और एकीकृत यातायात एवं परिवहन नियोजन की आवश्यकता है। यातायात जाम को कम करने के लिए बहुआयामी सार्वजनिक परिवहन अत्यंत जरूरी है, जिसका उद्देश्य वर्तमान 30 से 35 प्रतिशत यात्राओं के बजाय 70 से 80 प्रतिशत यात्राओं को सार्वजनिक परिवहन के माध्यम से संचालित करना है। इसके लिए सार्वजनिक परिवहन के विभिन्न साधनों के लिए समर्पित कारिडोर का प्रविधान आवश्यक है। पारगमन उन्मुख विकास (टीओडी) क्षेत्रों में सघनता और विकास से पहले पारगमन गलियारों की सावधानीपूर्वक योजना बनाना आवश्यक है।

    चूंकि महानगरीय क्षेत्र के बाहरी क्षेत्रों में जनसंख्या और आर्थिक विकास की गति तेज हो रही है, इसलिए क्षेत्रीय स्तर पर पुनर्गठन और स्थिरता के माध्यम से प्रारंभिक स्थानिक नियोजन, पारिस्थितिकी संरक्षण और ग्रामीण-शहरी निरंतरता पर ध्यान केंद्रित करना भी आवश्यक है।

    मेगा ट्रांजिट परियोजनाओं और राजमार्गों की सावधानीपूर्वक योजना इस प्रकार बनाई जानी चाहिए कि पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों और दोपहिया वाहनों/मध्यवर्ती सार्वजनिक परिवहन के लिए आवागमन कम से कम सीमित हो। एक कम लागत वाला समाधान प्रमुख सड़कों पर दाहिने हाथ के मोड़ों को धीरे-धीरे बंद करना है। यदि ऐसे 50 प्रतिशत मोड़ भी बंद कर दिए जाएं, तो इससे बिना सिग्नल के यातायात सुचारू रूप से चलने में काफी मदद मिलेगी और जाम कम होगा। 

    सार्वजनिक परिवहन (बीआरटी, आरआरटी और मेट्रो) के अलावा, गैर-मोटरयुक्त परिवहन, और प्रदूषण रहित, हाइब्रिड, हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना आवश्यक है। जल संसाधन और यमुना नदी का पुनरुद्धार: दिल्ली में यमुना नदी 27 प्रमुख नालों, औद्योगिक अपशिष्ट डंपों, फ्लाई ऐश तालाबों, सीवेज रहित झुग्गी-झोपड़ियों और अनधिकृत कालोनियों से निकलने वाले सीवेज के कारण एक गंदी नाली बन गई है।

    सभी अनियोजित क्षेत्रों में सीवेज की प्राथमिकता के आधार पर व्यवस्था करना आवश्यक है। स्पंज सिटी (जो शहर के भीतर ही वर्षा जल को रोकती हैं), अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण, शून्य अपशिष्ट निर्वहन, नदी स्वास्थ्य निगरानी, जल संवेदनशील बाढ़ क्षेत्र प्रबंधन जैसे समाधान नदी पारिस्थितिकी में सुधार के लिए अपरिहार्य हैं।

    जलवायु और आपदा प्रतिरोध तथा ताप शमन योजना के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं, जो दिल्ली सहित एनसीआर को भूकंप, आपदाओं और रासायनिक, जैविक, रेडियोलाजिकल और परमाणु (सीबीआरएन) हमलों के खिलाफ तैयार करेंगे।

    शहरी क्षेत्रों में हीट एक्शन प्लान और फुटपाथों, सड़कों, छतों/दीवारों, जल फव्वारों, हरियाली, वनस्पतियों और अनुप्रस्थ वेंटिलेशन का अनिवार्य उपयोग आवश्यक है। लगभग आधी आबादी और 70 प्रतिशत गरीब झुग्गी-झोपड़ियों, अवैध बस्तियों और अनौपचारिक बस्तियों में रहते हैं। उच्च घनत्व, ऊंची इमारतों वाले पुनर्वास पैटर्न द्वारा झुग्गी पुनर्वास के वर्तमान प्रदाता माडल की समीक्षा करने की आवश्यकता है। झुग्गी पुनर्वास के लिए सब्सिडी प्रदान करने के जुनून के कारण छोटे-छोटे फ्लैटों का निर्माण और उनका अवैध हस्तांतरण हुआ है।

    झुग्गी आवास और पुनर्वास का कम से कम आधा हिस्सा सामुदायिक आधारित होना चाहिए, जो क्रमिक, सहायता-आधारित पुनर्वास के रूप में हो। समुदायों के संसाधनों के उपयोग की रणनीति को सरकार की उस रणनीति के साथ एकीकृत किया जा सकता है जिसमें सरकार भूमि और भूमि अधिकार निर्माण केंद्रों, भवन निर्माण केंद्रों की स्थापना, भवन निर्माण सामग्री बैंकों और कर/जीएसटी छूट प्रदान करने के लिए सुविधाकर्ता के रूप में कार्य करती है।

    सुरक्षित भूमि स्वामित्व झुग्गी पुनर्वास की नींव है। समुदाय सहकारी भूमि खरीद, दीर्घकालिक पट्टा अनुबंध, भूमि अदला-बदली या उपयोग अधिकार जैसी रणनीतियों के माध्यम से अपने स्वामित्व संबंधी समझौतों पर बातचीत कर सकते हैं।

    एक दशक में इन क्षेत्रों पर काम करने की जरूरत 

    •  भूमि पूलिंग और शहरी विस्तार योजना
    •  डिजिटल नवाचार और नई प्रौद्योगिकियां
    •  एकीकृत कमान और नियंत्रण केंद्र (आइसीसीसी)
    •  समग्र सरकारी मंच, प्रगति, दर्पण 2.0
    •  एकीकृत विकास नियंत्रण और भवन विनियम

    दृष्टि योजना (20 वर्ष) का उद्देश्य 

    • क्षेत्रीय विकेंद्रीकरण
    • औद्योगिक नीति और विकास
    • कानूनी और वित्तीय उपाय
    • क्षेत्रीय परिवहन गलियारे
    • वन, वन्यजीव अभयारण्य, अरावली पर्वतमाला, यमुना नदी और जल निकायों सहित प्राकृतिक क्षेत्र
    • स्थानीय खाद्य उत्पादन और शहरी कृषि
    • हरित अवसंरचना और चक्रीय अर्थव्यवस्था
    • शहरी वित्तपोषण के लिए निवेश जुटाना और वित्तपोषण करना।

    अशोक कुमार जैन, पूर्व योजना आयुक्त, दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने जैसा संजीव गुप्ता को बातचीत में बताया