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    31 साल बाद मिली कलंक से मुक्ति : 1994 के रिश्वत मामले में दिल्ली HC ने पलटा ट्रायल कोर्ट का फैसला, पाया निर्दोष

    Updated: Sun, 04 Jan 2026 07:51 PM (IST)

    दिल्ली हाईकोर्ट ने 1994 के 2000 रुपये रिश्वत मामले में अवर अभियंता मोहम्मद अब्बास को 31 साल बाद बरी कर दिया। न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी की पीठ ने कहा ...और पढ़ें

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    विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। वर्ष 1994 में महज 2000 हजार रुपये की रिश्वत के मामले में अवर अभियंता मोहम्मद अब्बास के दामन पर लगा भ्रष्टाचार का दाग आखिरकार 31 साल बाद धुल गया। ट्रायल कोर्ट के निर्णय के खिलाफ दायर अपील याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने 23 साल बाद निर्णय पारित करते हुए अपीलकर्ता अवर अभियंता को रिश्वतखाेरी मामले में बरी कर दिया। न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी की पीठ ने कहा कि प्रकरण से जुड़े सभी तथ्योें व परिस्थितियों को देखते हुए अभियोजन पक्ष अपीलकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपाें को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

    कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया

    अदालत ने कहा कि मामले से जुड़े कुछ दस्तावेज को 27 जुलाई 1994 से 20 जुलाई 1994 तक की पिछली तारीख का दिखाया गया था। हालांकि, अभियोजन पक्ष यह समझाने में नाकाम रहा कि अगर 17 जुलाई 1994 की कब्जा स्लिप पहले से ही थी और आवंटी मधु शर्मा द्वारा उसी तारीख को साइन की गई इन्वेंटरी चेक लिस्ट भी थी, तो 27 जुलाई 1994 को जल्दी कब्जा के लिए अपीलकर्ता से संपर्क करने की क्या जरूरत थी। इस बारे में अभियोजन पक्ष की तरफ से कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। पीठ ने यह भी कहा कि मामले में शिकायतकर्ता एम शर्मा से पूछताछ नहीं की।

    शिकायतकर्ता से पूछताछ नहीं की

    पीठ ने यह भी रिकाॅर्ड पर लिया कि अभियोजन पक्ष ने दावा किया है कि रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार करना शिकायतकर्ता की पत्नी और गवाह अनिश कुमार की मौजूदगी में हुआ था, लेकिन जांच एजेंसी ने शिकायतकर्ता से पूछताछ नहीं की। पीठ ने कहा कि गवाह अभियोजन पक्ष के लिए किसी काम का नहीं है क्योंकि उसने अपील करने वाले की पहचान नहीं की और तो और उसका बयान भी उल्टा-पुल्टा था।

    00 रुपये का जुर्माना भी था लगाया

    पीठ ने रिकाॅर्ड पर लिया कि गवाह ने शुरू में कहा था कि अवर अभियंता ने पैसे मांगे थे, लेकिन क्रास-एग्जामिनेशन में उसने कहा कि उसे याद नहीं है कि उसने अवर अभियंता को पैसे मांगते हुए सुना था या नहीं।

    अपीलकर्ता अवर अभियंता ने 26 जुलाई 2002 के आदेश को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपीलकर्ता मोहम्मद अब्बास को चार साल के कठाेर कारावास की सजा सुनाई थी और 500 रुपये का जुर्माना भी लगाया था।

    हालांकि, उक्त आदेश के खिलाफ दायर अपील याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को 12 अगस्त 2002 को निलंबित कर दिया था।

    रिश्वत मांगने का एक विंग कमांडर ने आरोप था लगाया

    याचिका के अनुसार अपीलकर्ता पर वसंज कुंज में एक डीडीए भवन आवंटन में रिश्वत मांगने का एक विंग कमांडर ने आरोप लगाया था। शिकायतकर्ता विंग कमांडर एम शर्मा ने आरोप लगाया था कि अपीलकर्ता ने उनकी पत्नी मधु शर्मा से भवन पर कब्जा देने के लिए दो हजार रुपये की रिश्वत की मांग की थी। जांच एजेंसी ने आरोप लगाया था कि अपीलकर्ता ने दो रुपये रिश्वत की मांग की थी और एक हजार रुपये लेकर अपनी मेज की ड्रायर में रखे थे।

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