पर्यावरण व जल संरक्षण का संदेश देता है छठ महापर्व
गौतम कुमार मिश्रा, पश्चिमी दिल्ली : लोक आस्था से जुड़े महापर्व छठ में पर्यावरण व जल संरक्षण का ...और पढ़ें

गौतम कुमार मिश्रा, पश्चिमी दिल्ली : लोक आस्था से जुड़े महापर्व छठ में पर्यावरण व जल संरक्षण का संदेश निहित है। इस महापर्व की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें इस्तेमाल की जाने वाली सभी सामग्रियां सीधे भारतीय संस्कृति से जुड़ी हैं और उनका वैज्ञानिक महत्व है।
छठ महापर्व में इस्तेमाल किए जाने वाले सामग्रियों की बात करें तो इसमें फल, सब्जी व बांस से तैयार उन बर्तनों का इस्तेमाल विशेष तौर पर किया जाता है जो देश की ग्रामीण संस्कृति से सीधे तौर पर जुड़ी है। सूप हो या फिर दउरा इन सभी का इस्तेमाल आज भी देहातों में होता है। गांव के कारीगर ही इन्हें बनाते हैं। इसी तरह फलों की बात करें तो छठ में केले का इस्तेमाल विशेष तौर पर किया जाता है। पूर्वांचल के ग्रामीण इलाकों में केला आसानी से उपलब्ध है। ऐसे ही नारियल भी आसानी से उपलब्ध है। हल्दी व मूली की बात करें तो गांव के बगीचे में लोग इन्हें लगाते ही हैं। छठ में प्रसाद के लिए बनाए जाने वाले ठेकुआ व भूसबा (चावल को पीसकर बनाया जाने वाला लड्डू) को भी लोग घरों में तैयार करते हैं। छठ में घाट पर मिट्टी के बने हाथी का इस्तेमाल दीप स्तंभ के तौर पर किया जाता है। यह पशुओं को हमारी संस्कृति में दिए जाने वाले सम्मान का परिचायक है। यह ही एक ऐसा पर्व है जिसमें पूजा के लिए पंडित की आवश्यकता जरूरी नहीं है और न ही मंत्रों का उच्चारण होता है। पूजा के दौरान महिलाएं अपने गीतों के माध्यम से भगवान भाष्कर और छठी मईया का बखान करती हैं। गीत गाने की यह परंपरा सीधे तौर पर हमारी संस्कृति और सभ्यता की पहचान है। परंपरा के अनुसार छठ के दौरान भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के लिए लोग तालाब, नदी, नहर का रुख करते हैं। यह परंपरा जल संरक्षण का संदेश देता नजर आता है।

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