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एंटीबायोटिक के गलत इस्तेमाल से सामान्य संक्रमण भी हो सकते हैं जानलेवा, WHO और ICMR की रिपोर्ट ने चेताया

Published: Fri, 02 Jan 2026 05:34 AM (IST)Updated: Fri, 02 Jan 2026 06:50 AM (IST)

एंटीबायोटिक दवाओं के गलत और अनावश्यक उपयोग से सामान्य संक्रमण भी जानलेवा बन रहे हैं। डब्ल्यूएचओ और आईसीएमआर की रिपोर्टों ...और पढ़ें

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HighLights

  1. एंटीबायोटिक के गलत उपयोग से सामान्य संक्रमण जानलेवा बन रहे हैं

  2. भारत में बैक्टीरिया तेजी से दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो रहे

  3. डॉक्टर की सलाह बिना एंटीबायोटिक न लेने की अपील

अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ल्ली। एंटीबायोटिक दवाओं का बिना जरूरत व बिना चिकित्सकीय सलाह का उपयोग आम संक्रमणों को भी गंभीर व उपचाररोधी बना रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ग्लोबल एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस सर्विलांस रिपोर्ट 2025 और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की रिपोर्ट बताती हैं कि दवाओं के प्रति बैक्टीरिया तेजी से प्रतिरोधी (ऐसे बैक्टीरिया, जो कई एंटीबायोटिक दवाओं पर असर नहीं करते) होते जा रहे हैं।

देश में हर साल बड़े पैमाने (करीब 60 हजार) पर होने वाली नवजात शिशुओं की मौत में प्रतिरोधी संक्रमण को बड़ा कारण माना जा रहा है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर इस स्थिति को रोका नहीं गया तो भविष्य में सामान्य संक्रमण जानलेवा साबित हो सकते हैं।

डब्ल्यूएचओ और आईसीएमआर के आंकड़े बताते हैं कि देश में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है। हालात ऐसे हैं कि जिन बीमारियों का इलाज पहले कुछ दिनों में हो जाता था, वे अब लंबे इलाज और ज्यादा खर्च की वजह बन रही हैं।

डब्ल्यूएचओ के अनुसार वर्ष 2018 से 2023 के बीच विश्व स्तर पर निगरानी किए गए रोगाणु-दवा संयोजनों में से 40 प्रतिशत से अधिक में प्रतिरोध बढ़ा है। दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र, जिसमें भारत भी शामिल है, इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में गिना गया है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग नियंत्रित नहीं किया गया, तो सामान्य संक्रमण भी भविष्य में जानलेवा हो सकते हैं।

भारतीय स्थिति डराने वाली

भारतीय की स्थिति और भी डराने वाली है। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के मुताबिक भारत में अस्पताल पहुंचने वाले लगभग 83 प्रतिशत मरीजों में मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट आर्गेनिज्म पाए गए हैं। यानी ऐसे बैक्टीरिया, जो कई एंटीबायोटिक दवाओं पर असर नहीं करते। इनमें से करीब 70 प्रतिशत मरीजों में ईएसबीएल-उत्पादक बैक्टीरिया और लगभग 23 प्रतिशत में कार्बापेनेम-रेजिस्टेंट बैक्टीरिया मिले, जो अंतिम विकल्प की दवाओं पर भी प्रतिक्रिया नहीं देते।

एमआरएसए प्रतिरोध दर 50 से 60

आईसीएमआर की राष्ट्रीय एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस सर्विलांस रिपोर्ट बताती है कि भारत में ई. कोलाई, क्लेब्सिएला न्यूमोनिए, एसिनेटोबैक्टर, प्स्यूडोमोनेस एरुगिनोसा और स्टैफिलोकोकस आरियस (एमआरएसए) जैसे बैक्टीरिया तेजी से प्रतिरोध विकसित कर रहे हैं। ये बैक्टीरिया मूत्र संक्रमण, निमोनिया, रक्त संक्रमण और आईसीयू से जुड़े मामलों में सबसे ज्यादा सामने आ रहे हैं। कई अस्पतालों में एमआरएसए की प्रतिरोध दर 50 से 60 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।

स्थिति चिंताजनक

भारत दवाओं के स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। सेफालोस्पोरिन, सिप्रोफ्लाक्सासिन और को-ट्राइमोक्साजोल जैसी आम एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ व्यापक प्रतिरोध दर्ज किया गया है।

अब चिंता इस बात की भी है कि कार्बापेनेम और कोलिस्टिन जैसी आरक्षित और अंतिम विकल्प मानी जाने वाली दवाओं पर भी प्रतिरोध उभर रहा है, जिससे इलाज के विकल्प सीमित होते जा रहे हैं।

डब्ल्यूएचओ ने स्पष्ट किया है कि एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस केवल संक्रमण तक सीमित समस्या नहीं है। इसका असर सर्जरी, कैंसर उपचार, नवजात शिशु देखभाल और गहन चिकित्सा इकाइयों पर भी पड़ रहा है।

क्या होता है एमआरएसए?

एमआरएसए यानी मेथिसिलिन-रेजिस्टेंट स्टैफिलोकोकस आरियस एक ऐसा खतरनाक बैक्टीरिया है, जो सामान्य तौर पर उपयोग की जाने वाली एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति ‘प्रतिरोधी’ होता है। यह त्वचा, फेफड़े और खून में गंभीर संक्रमण फैलाता है। गलत दवा उपयोग से इसका खतरा तेजी से बढ़ रहा है।

पीएम ने भी जताई है चिंता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी ‘मन की बात’ कार्यक्रम में एंटीबायोटिक के अधिक और गलत उपयोग पर चिंता जता चुके हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि डॉक्टर की सलाह के बिना एंटीबायोटिक न लेना, पूरा कोर्स करना और आत्म-दवा से बचना ही इस बढ़ते खतरे को रोकने का सबसे प्रभावी उपाय है।