जहां बचती है जान, वहीं पनप रहा संक्रमण; ICU पर AIIMS की चौंकाने वाली रिपोर्ट
एम्स, नई दिल्ली के एक अध्ययन से पता चला है कि आईसीयू गंभीर मरीजों के लिए संक्रमण का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता, लंबे समय त ...और पढ़ें
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जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। गंभीर मरीजों को जीवनरक्षक इलाज देने वाली आइसीयू (इंटेंसिव केयर यूनिट) अब संक्रमण के सबसे बड़े केंद्र के रूप में सामने आ रही है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली में किए गए अध्ययन और अस्पताल आधारित निगरानी से पता चला है कि आइसीयू में भर्ती मरीजों में संक्रमण का खतरा सबसे अधिक होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता, लंबे समय तक भर्ती और अत्याधुनिक उपकरणों का लगातार इस्तेमाल इस खतरे को और बढ़ा देता है।
एम्स के अध्ययन से खुलासा
एम्स के माइक्रोबायोलाजी एवं इंफेक्शन कंट्रोल विभाग द्वारा आइसीयू मरीजों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि अस्पताल में होने वाले संक्रमणों (हास्पिटल एक्वायर्ड इंफेक्शन) का सबसे बड़ा हिस्सा आइसीयू से जुड़ा होता है।

इस अध्ययन में फेफड़ों के संक्रमण (निमोनिया), मूत्र मार्ग संक्रमण, रक्त संक्रमण और आपरेशन के बाद होने वाले इंफेक्शन को सबसे ज्यादा गंभीर बताया गया है।
वेंटिलेटर और कैथेटर बढ़ाते हैं जोखिम
एम्स की माइक्रोबायोलाजी विभाग की प्रोफेसर और हास्पिटल इंफेक्शन कंट्रोल प्रमुख डा. पूर्वा माथुर के अनुसार 'आइसीयू में मरीज वेंटिलेटर, यूरिन कैथेटर और सेंट्रल लाइन जैसे उपकरणों पर निर्भर रहते हैं। यही उपकरण संक्रमण के प्रवेश का सबसे बड़ा रास्ता बनते हैं, खासकर तब जब मरीज लंबे समय तक आइसीयू में रहता है।' उनका कहना है कि वेंटिलेटर से जुड़ा निमोनिया आइसीयू में होने वाले संक्रमणों में सबसे आम और सबसे घातक है।
एंटीबायोटिक पर असर नहीं, इलाज बनता है चुनौती
अध्ययन में यह भी सामने आया कि आइसीयू में फैलने वाले कई बैक्टीरिया सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं पर असर नहीं दिखाते। डा. पूर्वा माथुर बताती हैं,
'मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट बैक्टीरिया आइसीयू की सबसे बड़ी चुनौती हैं। ऐसे संक्रमणों में इलाज लंबा, महंगा और कई बार जानलेवा हो जाता है।
संक्रमण रोकने के लिए सख्त व्यवस्था जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार, हाथों की स्वच्छता, उपकरणों की नियमित स्टरलाइजेशन, एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण इस्तेमाल और मरीजों की लगातार निगरानी से संक्रमण को काफी हद तक रोका जा सकता है। एम्स के डाक्टरों ने सभी अस्पतालों में सख्त इंफेक्शन कंट्रोल प्रोटोकाल और नियमित आडिट लागू करने पर जोर दिया है, ताकि आइसीयू में भर्ती गंभीर मरीजों की जान सुरक्षित रखी जा सके।
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