रायपुर, निप्र। '2003 में अयोध्या में मंदिर-मजिस्द विवाद गहराया था। लखनऊ हाईकोर्ट में केस चल रहा था। एक दिन विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल का टेलीफोन आया कि मुझसे आकर मिलो। उनसे आरके पुरम में मुलाकात हुई। बोले-वास्तव में योध्या में क्या है, अध्ययन करो। मैंने अध्ययन किया, जो तथ्य सामने आए वे चौंकाने वाले थे। मैंने लखनऊ हाईकोर्ट में कहा- अयोध्या में जिस मजिस्द [ बाबरी ] के होने का दावा किया जा रहा है, वह थी ही नहीं। कभी नमाज नहीं प़ढी गई। अधूरे निर्माण की वजह से उसे ना-पाक कहा जाता था।'

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हाईकोर्ट में इतने महत्वपूर्ण तथ्य रखने वाले और छत्तीसग़ढ में कई पुरातात्विक साइट्स खोजने वाले पुरातत्ववेत्ता अरुण शर्मा को पद्म श्रेणी में भारत का तीसरा सबसे ब़डा नागरिक सम्मान पद्मश्री देने की घोषणा हुई है। उन्होंने 2003 की इस खोज को अपनी सबसे ब़डी उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि मंदिर का निर्माण तीन स्तर पर हुआ। शुरुआत ईसा पूर्व तीसरी सदी में हुई। उसके बाद 1339 में, जबकि 1429 में बाबर भारत आया था। शर्मा ने सिरपुर की खोज की, उनका दावा है कि सिंधु सभ्यता भारत की है की जानकारी भी उन्होंने ही दी है। घा़ेडे कच्छ में 5500 साल पहले थे।
खुदाई जारी रहेगी
'नईदुनिया' को इस उपलब्धि पर पहली प्रतिक्रिया में शर्मा ने कहा कि अपने कर्तव्यों का पालन ईमानदारी से किया। जितनी खुदाई की, उन सबका डाक्यूमेंटेशन किया। हां, पद्मश्री मिलने में था़ेडी देर हुई, लेकिन उम्मीद थी कि मिलेगा। अब 84 का हो गया हूं, लेकिन खुदाई जारी रहेगी। आप देखिएगा राजिम में इतिहास निकलेगा, दुनिया देखती रह जाएगी। सिरपुर यूं ही उपलब्धि नहीं है।

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Posted By: Bhupendra Singh

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