जिस घर होता था Bajaj का ये प्रोडक्ट कहलाता था वो संपन्न परिवार; भारतीयों का कैसे बना सपना?
1970 से 1990 के दशक में बजाज स्कूटर भारतीय मिडिल क्लास के लिए सिर्फ एक सवारी नहीं, बल्कि संपन्नता और सपनों की चाबी था। 'जिस घर में बजाज है, वो घर बस ग ...और पढ़ें

'नौकरी, शादी, परिवार सब कुछ सेट...' जिस घर में होता था Bajaj का ये प्रोडक्ट कहलाता था संपन्न परिवार।
नई दिल्ली। अब के दौर में गाड़ी खरीदना कुछ क्लिक या आसान EMI का मामला है। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब स्कूटर मिल जाना जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धी होती थी। खासकर अगर वह स्कूटर बजाज का हो। 1970 से 1990 के दशक तक भारतीय मिडिल क्लास के लिए बजाज स्कूटर सिर्फ एक सवारी नहीं, बल्कि सपनों की चाबी थी। उस दौर में कहा जाता था कि ''जिस घर में बजाज है, वो घर बस गया।''
मिडिल क्लास और बजाज का अटूट रिश्ता
उस समय बजाज ग्रुप (Bajaj Group) का स्कूटर भारतीय परिवारों की आकांक्षाओं का केंद्र बन हुआ था। बजाज चेतक का मतलब हुआ करता था- नौकरी लग गई, शादी तय हो गई, परिवार अब ''सेटल'' हो गया। एक स्कूटर ने सामाजिक हैसियत तय कर दी थी।
10 साल की वेटिंग, फिर भी कम था इंतजार
अब यह कल्पना करना मुश्किल है, लेकिन तब बजाज स्कूटर के लिए 5 से 10 साल तक की वेटिंग आम बात थी। बुकिंग रसीद संभालकर रखी जाती थी। हर साल डीलर से पूछा जाता था कि नंबर कब आएगा? तब सिफारिश और पहचान भी काम आती थी। जिस दिन स्कूटर मिलने का फोन आता, वह दिन त्योहार से कम नहीं होता।
पूजा, नारियल और पहली सवारी
नया बजाज स्कूटर आते ही घर के बाहर नारियल फोड़ा जाता, अगरबत्ती जलाई जाती, बच्चों को सबसे आगे बैठाया जाता और पूरे मोहल्ले को खबर हो जाती थी। ''शर्मा जी के घर बजाज आ गया!'' पहली सवारी अक्सर मंदिर या रिश्तेदार के घर की होती थी। दूरदर्शन पर आने वाला विज्ञापन ''हमारा बजाज'' ने स्कूटर को राष्ट्र भावना से जोड़ दिया।
कितना है बजाज ग्रुप का मार्केट कैप
बजाज समूह के फाउंडर जमनालाल बजाज थे। उनके पुत्र कमलनयन बजाज और रामकृष्ण बजाज ने इसे आगे बढ़ाया। फिर राहुल बजाज ने इसका नेतृत्व किया। अब बजाज ग्रुप का मार्केट कैप लगभग 14 लाख करोड़ रुपये (लगभग 167 अरब अमेरिकी डॉलर) है, जिसमें 40 समूह कंपनियां और लगभग 1,00,000 कर्मचारी शामिल हैं।

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