नई दिल्ली (बिजनेस डेस्क)। अक्सर यह शब्द किसी धोखाधड़ी या किसी कंपनी के छोटे निवेशकों की पूरी जमा पूंजी को लेकर भाग जाने के कारण चर्चा में आता है। भारत में यह कारोबार विशेषकर दक्षिणी और पूर्वी भारत के राज्यों में संगठित तौर पर फलता फूलता रहा है। लेकिन यह जानना जरूरी है कि भारत में चिट फंड का बिजनेस वैध और कानूनी तौर पर नियंत्रित है। चिट फंड्स एक्ट 1982 में ऐसी कंपनियों को परिभाषित किया गया है। इसके अलावा राज्यों में बने कानून इस बिजनेस को नियंत्रित करते हैं।

दक्षिण भारत के राज्यों में बड़ी संख्या में लोग ऐसी योजनाओं में अपना बचत निवेश करते हैं। आंध्र, तमिल और केरल की घरेलू अर्थव्यवस्था में चिट फंड का बड़ा योगदान रहा है। इन राज्यों में वहां की घरेलू बचत का अच्छा हिस्सा इन योजनाओं में लगा हुआ है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर चिट फंड होता क्या और यह काम कैसे करता है?

चिट फंड बचत का एक तरीका है, जो लोगों को आसान कर्ज उपलब्ध कराने के साथ ही उनके निवेश पर ज्यादा रिटर्न देता है। बैंक से कर्ज लेने के लिए आम तौर पर कई छोटी-मोटी लेकिन जरूरी औपचारिकताओं को पूरा करना होता है, लेकिन चिट फंड में इसकी कोई बाध्यता नहीं होती। निवेश के अन्य विकल्पों के मुकाबले चिट फंड में ज्यादा रिटर्न मिलता है और कई बार यही लालच लोगों के नुकसान का कारण भी बनता है।

अब इसे उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं-

जब आप बैंक में पैसा जमा करते हैं, तो बैंक उस पैसे को किसी व्यक्ति या संस्था को कर्ज में देकर उससे ब्याज की कमाई करता है, जिसका एक हिस्सा आपको आपकी बचत पर ब्याज के रूप में मिलता है। लेकिन चिट फंड में यह अलग तरीके से काम करता है।

मान लीजिए 10 लोग मिलकर एक फंड बनाते हैं और उन्हें इसमें हर महीने 10-10 हजार रुपये जमा करने होते हैं। अगर यह चिट यानी कुल जमा एक लाख रुपये का है तो हर व्यक्ति अगले 10 महीने तक इस फंड में अपने हिस्से का 10-10 हजार रुपये जमा करता रहेगा।

मतलब फंड का साइज-एक लाख रुपये का होगा।

इसकी अवधि यानी मैच्युरिटी पीरियड-10 महीनों की हुई।

अगर यह फंड कानूनी तौर पर रजिस्टर्ड है तो यह पूरी रकम बैंक में जमा हो जाएगी, और तब तक इसे नहीं निकाला जा सकेगा, जब तक कि 10 महीने की अवधि पूरी नहीं हो जाती है। लेकिन अगर यह फंड रजिस्टर्ड नहीं है तो क्या होगा?

यह समझने के पहले अब चिट फंड ऑपरेटर की भूमिका को समझ लेते हैं, जिसे हम चिट फंड कंपनी भी बुलाते हैं। जो कंपनी इन 10 लोगों के फंड को ऑपरेट करेगी, वह इसके बदले में एक कमीशन अमाउंट चार्ज करती है, जो आम तौर पर 3 फीसद से लेकर 10 फीसद होता है।

चलिए मान लेते हैं कि फंड ऑपरेटर ने इन 10 लोगों की चिट को मैनेज करने के लिए पांच फीसदी कमीशन लिया। तो पहले महीने 10 लोगों ने मिलकर कुल एक लाख रुपये जमा किए और फंड ऑपरेटर ने इसमें से पांच फीसद कमीशन यानी 5,000 रुपये ले लिए, जिसके बाद फंड की कुल रकम 95,000 रुपये हो गई। इसे ऑपरेटर ने अपने पास रख लिया।

अब अगर इन 10 व्यक्तियों के समूह में से किसी एक को कर्ज की जरूरत है, तो वह रकम के लिए बोली लगाएगा। जिसकी बोली सबसे कम होगी, उसे यह रकम दे दी जाएगी। मान लीजिए किसी व्यक्ति ने 60,000 रुपये की बोली लगाई और यह सबसे कम रही, तो उसे यह रकम दे दी जाएगी।

इस रुपये को दिए जाने के बाद फंड ऑपरेटर के पास 35,000 रुपये बच गए। इस रकम को 10 लोगों में बराबर-बराबर बांट दिया जाएगा। यानी पहले ही महीने 5,000 रुपये के निवेश पर प्रति व्यक्ति को 3500 रुपये मिले।

और जिस व्यक्ति ने पहले महीने मात्र 5,000 रुपये जमा किए, उसे 60,000 रुपये का कर्ज आसानी से मिल गया। यह सिलसिला अगले 10 महीनों तक चलता रहेगा।

फंड की वजह से लोगों को बेहद कम ब्याज दर पर कर्ज मिला और साथ ही बचत पर भारी निवेश भी।

कारोबार का यही तरीका चिट फंड कहलाता है।

अब आते हैं सारदा चिट फंड पर-

2000 के शुरुआती महीनों में कारोबारी सुदीप्तो सेन ने सारदा ग्रुप की शुरुआत की, जिसे सेबी ने बाद में कलेक्टिव इनवेस्टमेंट स्कीम के तौर पर वर्गीकृत किया। सारदा ग्रुप ने चिट फंड की तर्ज पर ज्यादा रिटर्न का लालच देकर छोटे निवेशकों को आकर्षित किया। अन्य पोंजी स्कीम (चिट फंट कंपनी) की तरह कंपनी ने एजेंट के बड़े नेटवर्क का इस्तेमाल करते हुए छोटे लोगों से पैसों की उगाही की और इसके लिए एजेंट को 25 फीसद तक का कमीशन दिया गया।

कुछ ही सालों में सारदा ने करीब 2,500 करोड़ रुपये तक की पूंजी जुटा ली। कंपनी ने फिल्मस्टार, फुटबॉल क्लब में निवेश, मीडिया आउटलेट्स की खरीदारी कर अपनी ब्रांड बिल्डिंग की। स्कीम का दायरा ओडिशा, असम और त्रिपुरा तक फैला, जिसमें करीब 17 लाख से अधिक लोगों ने पैसे लगाए।

इस बीच सारदा ग्रुप ने डिबेंचर और प्रीफरेंशियल बॉन्ड जारी करना शुरू किया, जो सेबी के नियमों का उल्लंघन था। सेबी की चेतावनी के बाद ग्रुप ने करीब 200 से अधिक कंपनियों का जाल खड़ा करते हुए अपने बिजनेस को आगे बढ़ाया। छोटे निवेशकों ने जहां समूह में निवेश जारी रखा वहीं कई लोगों ने चिट फंड एक्ट 1982 के तहत समूह में निवेश किया। बंगाल में चिट फंड का कारोबार सरकार नियंत्रित करती है।

2012 में सेबी ने इस समूह को लोगों से पैसा जुटाने के लिए मना किया। 2013 तक आते-आते ग्रुप की हालत खराब होने लगी। कंपनी के पास आने वाली पूंजी की मात्रा, खर्च हो रही पूंजी से कम हो गई, और फिर अप्रैल 2013 में यह धराशायी हो गई। कोलकाता के विधाननगर पुलिस स्टेशन में सैंकड़ों निवेशकों ने शिकायत दर्ज कराई। सुदीप्तो सेन ने 18 पन्नों का पत्र लिखकर बताया कि कैसे नेताओं ने उनसे जबरन गलत जगह निवेश कराया। सेन के खिलाफ एफआईआर हुआ और आखिरकार उन्हें 20 अप्रैल 2013 को गिरफ्तार कर लिया गया।

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Posted By: Abhishek Parashar

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