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    दाल-रोटी का भी मुश्किल से जुगाड़ कर पा रहे मजदूरी करने वाले लोग, ज्यादातर की कमाई 20 हजार से भी कम

    Updated: Sat, 17 Aug 2024 08:27 PM (IST)

    वर्कइंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 57.63 प्रतिशत से अधिक ब्लू-कॉलर जॉब वाले लोग हर महीने 20000 रुपये या इससे भी कम कमाते हैं। यह रकम देश में न्यूनतम वेतन सीमा के करीब है। वहीं करीब 29.34 प्रतिशत ब्लू-कॉलर जॉब वाले मिडल इनकम कैटेगरी में हैं। उनका वेतन 20 से 40 हजार रुपये के बीच है। सिर्फ 10.71 फीसदी लोगों को 40 से 60 हजार रुपये महीना का वेतन मिलता है।

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    नौकरियां अमूमन दो तरह की होती हैं, व्हाइट-कॉलर और ब्लू-कॉलर।

    बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। भारत में अधिकतर ब्लू-कॉलर जॉब में तनख्वाह 20 हजार रुपये या इससे भी कम है। यह तबका वित्तीय तनाव से गुजर रहा है। उसे आवास, चिकित्सा और शिक्षा जैसी जरूरतों को पूरा करने में भारी मुश्किल हो रही है। यह जानकारी ब्लू कॉलर भर्ती प्लेटफॉर्म वर्कइंडिया के एक रिपोर्ट से मिली है। इससे देश की वर्कफोर्स के एक बड़े हिस्से की आर्थिक मुश्किलों का पता चलता है।

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    क्या होती है ब्लू कॉलर जॉब?

    नौकरियां अमूमन दो तरह की होती हैं, व्हाइट-कॉलर और ब्लू-कॉलर। व्हाइट-कॉलर में दफ्तरों में काम करने वाले पेशेवर लोग आते हैं, जिन्हें शारीरिक मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ती। वहीं, ब्लू कॉलर में शारीरिक तौर पर अधिक मेहनत करने वाले लोग आते हैं, जिन्हें अपेक्षाकृत कम तनख्वाह मिलती है। जैसे कि वेल्डर, मैकेनिक, किसान, रसोइया, ड्राइवर आदि।

    क्या कहती है वर्कइंडिया रिपोर्ट?

    वर्कइंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 57.63 प्रतिशत से अधिक ब्लू-कॉलर जॉब वाले लोग हर महीने 20,000 रुपये या इससे भी कम कमाते हैं। यह रकम देश में न्यूनतम वेतन सीमा के करीब है। वहीं, करीब 29.34 प्रतिशत ब्लू-कॉलर जॉब वाले मिडल इनकम कैटेगरी में हैं। उनका वेतन 20 से 40 हजार रुपये के बीच है। इस कमाई में जरूरतें तो पूरी हो जाती हैं, लेकिन बचत या फिर निवेश के लिए गुंजाइश काफी कम बचती है।

    अच्छे वेतन के अवसर सीमित

    वर्कइंडिया के सीईओ और कोफ-फाउंजर नीलेश डूंगरवाल ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया, 'हमारे डेटा से पता चलता है कि ब्लू-कॉलर सेक्टर में कम वेतन वाली नौकरियों की संख्या ज्यादा है। वहीं, ज्यादा कमाई के अवसर सीमित हैं। इससे वर्कफोर्स के एक बड़े हिस्से की चुनौतियों का पता चलता है। सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विकास के लिए भी इसके गहरे मायने हैं।'

    सिर्फ 10% को अच्छा वेतन

    रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ 10.71 फीसदी लोगों को 40 से 60 हजार रुपये प्रति महीना का वेतन मिलता है। इनके पास कोई विशेष हुनर या फिर अनुभव है। इस तरह के पदों की उपलब्धता भी सीमित है। यहां तक पहुंचने या फिर इससे ऊपर जाने में लोगों को कड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

    कैसे दूर होगी समस्या?

    वर्कइंडिया के को-फाउंडर डूंगरवाल का कहना है कि श्रमिकों के बड़े हिस्से की दिक्कतों को दूर करने के लिए सामूहिक तौर पर प्रयास करना होगा। उनके हुनर को तराशना होगा, वेतन बढ़ाना होगा, साथ ही अधिक वेतन वाली नौकरियों के ज्यादा अवसर पैदा करने होंगे। बजट में भी केंद्र सरकार ने स्किल डेवलपेमेंट पर जोर दिया है।

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