राहुल की बिहार परिक्रमा वाली आधी से अधिक जमीन NDA की, क्या इस यात्रा से बदलेगी कांग्रेस की किस्मत?
राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा बिहार में कांग्रेस के लिए उम्मीद की किरण लेकर आई है। इस यात्रा का उद्देश्य कांग्रेस के बिखरे वोटों को एकजुट करना था। राहुल गांधी ने 16 दिनों में 23 जिलों का दौरा किया और विभिन्न समुदायों के साथ संवाद स्थापित किया। यात्रा के रूट निर्धारण में सहयोगी दलों की इच्छा का भी ध्यान रखा गया।

विकाश चन्द्र पाण्डेय, पटना। 'वोटर अधिकार यात्रा' के दौरान राहुल गांधी चाय-पानी के लिए पूर्णिया जिला में जिस 'अपना ढाबा' पर रुके थे, वह कसबा विधानसभा क्षेत्र में आता है।
यहां हैट्रिक लगा चुके कांग्रेस के आफाक आलम चौथी पारी के लिए अब कुछ अधिक आश्वस्त हो गए हैं, क्योंकि उन्हें लग रहा कि राहुल की यह यात्रा कांग्रेस के बिखरे वोटोंं को एकजुट कर गई है।
वस्तुत: इस यात्रा का उद्देश्य भी यही था, इसीलिए रूट ऐसा रहा कि पूरे बिहार की गोलाकार परिक्रमा करते हुए राहुल का उस समाज से संवाद हो, जो पिछले वर्षों में कांग्रेस से दूर होता गया है। इस संवाद-संदेश के लिए राहुल जिन विधानसभा क्षेत्रों से गुजरे, उनमेंं आधे से अधिक पर एनडीए का कब्जा है।
16 दिनों में 23 जिलों से होते हुए राहुल ने 1300 किलोमीटर से अधिक की यात्रा की है। उस दौरान उनका अंदाज जोशीला, आक्रामक और जनता से सीधे जुड़ाव का रहा।
इस जुड़ाव के लिए उन्होंने कांग्रेस के परंपरागत जनाधार (अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति, सवर्ण) के साथ पिछड़ा वर्ग पर विशेष विशेष फोकस किया, जिसे जोड़कर वे कांग्रेस के सामाजिक समीकरण की परिकल्पना कर रहे।
अनुसूचित जाति के लोगों के साथ चौपाल
इसी उद्देश्य से वजीरगंज में अनुसूचित जाति के लोगों के साथ चौपाल और फुलपरास मेंं पिछड़ा वर्ग के साथ संवाद-सभा हुई। अल्पसंख्यकोंं को साधने की गरज से वे मुंगेर में खानकाह रहमानी तक गए तो सवर्णों को रिझाने के लिए मंदिरों की परिक्रमा की।
विशेषकर ब्राह्मणों को प्रसन्न करने के लिए मिथिला और चंपारण तक की खाक छानी, जहां कांग्रेस की जमीन भाजपा-जदयू के साथ राजद ने भी हथिया ली है।
इस यात्रा में एक दर्जन विधानसभा क्षेत्रों के आंशिक भूभाग को छूने के साथ राहुल कुल 67 विधानसभा क्षेत्रों से गुजरे हैं। उनमें से 39 पर पिछली बार एनडीए विजयी रहा था। उसमें विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) द्वारा जीती गई बोचहा की सीट भी थी। वीआईपी तब एनडीए में थी।
वीआईपी के संस्थापक मुकेश सहनी को भी लेकर घूमे
उप चुनाव में वहां राजद को जीत मिली और अब वीआईपी ने भी पाला बदलकर महागठबंधन का साथ गह लिया है। वोटों के इस समीकरण का ख्याल रखते हुए राहुल अपने साथ वीआईपी के संस्थापक मुकेश सहनी को भी लेकर घूमे।
हालांकि, सूर्यगढ़ा में उनका स्वागत फीके उत्साह के साथ हुआ। 2020 में वहां प्रह्लाद यादव विजयी रहे थे, जो फिरंट होकर राजद का साथ छोड़ चुके हैं। अब वीआईपी यहां आस लगाए है।
इन पांच वर्षों में, आंशिक ही सही, सामाजिक समीकरण के साथ गठबंधन की परिस्थितियों मेंं भी परिवर्तन हुआ है, इसीलिए रूट के निर्धारण में कांग्रेस ने सहयाेगियों की इच्छा का भी कुछ ध्यान रखा। राजद की इच्छा से सिंकदरा और जमुई, जबकि माले की चाहत पर आरा रूट में जुड़े।
सासाराम से शुरुआत और आरा में यात्रा के समापन का निर्णय भी रणनीतिक रहा, क्योंकि शाहाबाद में महागठबंधन अपेक्षाकृत मजबूत है।
महागठबंधन की कुल नौ में से चार लोकसभा सीटें (सासाराम, काराकाट, बक्सर, आरा) इसी परिक्षेत्र से हैं। प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम की कुटुंबा सीट और आनंद शंकर की सिंह की औरंगाबाद इसी परिक्षेत्र से हैं। इनके साथ यात्रा के रूट में कुल पांच सीटें ऐसी रहीं, जहां कांग्रेस हैट्रिक लगाने की सोच रही।
यात्रा विशेषकर उन्हीं क्षेत्रों से गुजरी, जहां महागठबंधन को अपनी संभावना प्रबल लग रही। उनमें पिछली बार 113 मतों से हारी गई बरबीघा की सीट भी है, जिसके साथ प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह का राजनीतिक इतिहास जुड़ा हुआ है।
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