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    CNLU: क्‍या जन्म या पद से तय होती है महानता? मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने छात्रों को बताई कर्म की अहम‍ियत

    By Pratyush Pratap Singh Edited By: Vyas Chandra
    Updated: Sat, 03 Jan 2026 05:16 PM (IST)

    चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि महानता जन्म या पद से नहीं, बल्कि कर्मों से तय होती है। ...और पढ़ें

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    सीएनएलयू में छात्रों को संबोध‍ित करते सुप्रीम कोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश सूर्यकांत। जागरण

    विधि संवाददाता, पटना। चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (CNLU) के दीक्षांत समारोह में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा कि किसी व्यक्ति की महानता जन्म, पद या पहचान से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से तय होती है।

    उन्होंने विद्यार्थियों को यह स्मरण कराया कि वे जिस मुकाम पर पहुंचे हैं, वह किसी संयोग, विरासत या अधिकार का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों की निरंतर मेहनत, आत्मसंयम, अनुशासन और धैर्य का फल है।

    डिग्रियां उनके अतीत की पहचान नहीं, बल्कि इस बात की स्वीकृति हैं कि वे कठिन परिश्रम और बौद्धिक क्षमता का प्रदर्शन कर चुके हैं।

    बिहार की समृद्ध बौद्धिक और नैतिक परंपरा का उल्लेख करते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह भूमि तर्क, न्याय और नैतिकता की प्रयोगशाला रही है।

    बुद्ध की करुणा, महावीर की नैतिक दृढ़ता, डॉ. राजेंद्र प्रसाद की विनम्र सेवा भावना और जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति जैसे विचारों ने न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के सार्वजनिक जीवन को दिशा दी है।

    असफलताएं करियर को नहीं करती पर‍िभाष‍ित 

    उन्होंने युवा वकीलों को आत्ममूल्य पहचानने की सलाह देते हुए कहा कि पेशेवर दुनिया अक्सर पद, वेतन और त्वरित सफलता के आधार पर मूल्यांकन करती है, लेकिन ये अंतिम मापदंड नहीं हैं।

    किसी वकील का महत्व न तो पहले मुकदमे से तय होता है और न ही किसी अस्वीकृति से समाप्त होता है। महत्वाकांक्षा, यदि परिश्रम और जिम्मेदारी से जुड़ी हो, तो वह कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति है।

    मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि असफलताएं करियर को परिभाषित नहीं करतीं। अपने अनुभवों के आधार पर उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून के क्षेत्र में शुरुआती झटके अंतिम शब्द नहीं होते, बल्कि सीखने और मजबूती पाने के अवसर होते हैं।

    लगभग चार दशकों के अनुभव के आधार पर उन्होंने कहा कि यह पेशा धैर्य, आत्ममंथन और निरंतर प्रयास की सच्ची परीक्षा लेता है।

    अंत में उन्होंने संतुलन के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यदि कानून का पेशा जीवन के हर हिस्से पर हावी हो जाए, तो संवेदनशीलता और न्यायबुद्धि कमजोर पड़ सकती है।

    कक्षा के बाहर बिताए गए संवाद, मित्रता और विश्राम के क्षण जीवन और पेशे दोनों के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने छात्रों से आग्रह किया कि वे कानून से परे अपनी मानवीय पहचान को सुरक्षित रखें, तभी वे समग्र, संवेदनशील और प्रभावी वकील बन सकेंगे।