पटना [अरविंद शर्मा]। नए परिसीमन ने बिक्रमगंज संसदीय क्षेत्र का नाम बदलकर काराकाट कर दिया। भूगोल बदल गया। यहां तक कि सामाजिक समीकरण भी बदल गया, किंतु क्षेत्र का स्वभाव नहीं बदला। सियासी हस्तियों की दिलचस्पी ने जातीय चरित्र को आज भी कायम रखा है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले किसी और का वर्चस्व था। अब किसी और का है। रालोसपा प्रमुख एवं केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा और राजद नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री कांति सिंह के बीच की जोर आजमाइश ने इसे प्रदेश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित क्षेत्रों में शुमार कर रखा है। दोनों के अपने-अपने खेमे हैं। मुद्दे हैं। माहौल और जातियां हैं।

दुविधा में मतदाता

चुनावी साल में प्रवेश करने के दो महीने बाद भी काराकाट के मतदाता दुविधा में हैं। गठबंधनों की गांठ और अपने सांसद की रहस्यमय गतिविधियों ने उन्हें पूरी तरह भ्रमित कर रखा है। उन्हें नहीं पता है कि लड़ाई जब शुरू होगी तो कौन किसके पक्ष से लड़ेगा। अभी जो सामने दिख रहा है, उसमें उपेंद्र कुशवाहा और कांति सिंह के संघर्ष की चर्चा है। जंगे-मैदान में और भी कई चेहरे हैं, जिनपर पूरे प्रदेश की नजर होगी।

से हैं टिकट के दावेदार

यहां जातीय प्रतिद्वंद्विता के साथ-साथ दोनों गठबंधनों की परीक्षा भी होनी है। उपेंद्र अगर हिलते-मचलते या बदलते नहीं हैं तो राजग खेमे की तस्वीर अभी तक साफ है। इस खेमे से कोई दूसरा-तीसरा दावेदार नहीं होगा। किंतु विपरीत हालात में जदयू की दावेदारी आते देर नहीं होगी। जदयू नेता एवं पूर्व सांसद महाबली सिंह को शायद इसका अहसास भी हो गया है। इसीलिए उनकी सक्रियता बढ़ गई है।

पूर्व सांसद मीना सिंह ने भी काराकाट के फेरे बढ़ा दिए हैं। इस क्षेत्र पर उनका खानदानी हक बनता है, क्योंकि उनके ससुर और पति भी यहां से सांसद रह चुके हैं। नए परिसीमन के प्रभावी होने के पहले खुद भी मीना उपचुनाव में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।

हालांकि, कुशवाहा का काम इतना बुरा नहीं है कि उन्हें कोई चुनौती दे सके। मंत्री और एक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होते हुए भी उन्होंने क्षेत्र में काफी समय दिया है। डालमियानगर को फिर से बसाने की पहल की है। औरंगाबाद जिले के नए जुड़े विधानसभा क्षेत्रों में तीन-तीन केंद्रीय विद्यालय खुलवा दिया है।

महागठबंधन की ओर से राजद की कांति सिंह की लगातार दो हार नेतृत्व को सोचने पर विवश कर सकती है। ऐसे में पूर्व मंत्री इलियास हुसैन की वरिष्ठता काम आ सकती है। क्षेत्र के सामाजिक समीकरण के मुताबिक महागठबंधन में प्रत्याशी बदलने पर विचार किया जा सकता है। वैसे समाजवादी पार्टी को छोड़कर राजद में शामिल हुए रामचंद्र यादव की भी दावेदारी है। वह लालू प्रसाद को क्षेत्र का जातीय समीकरण समझा भी चुके हैं।

अतीत की राजनीति

1952 में यह क्षेत्र शाहबाद उत्तर-पश्चिम कहलाता था। निर्दलीय कमल सिंह ने कांग्रेस की कलावती देवी को हराया था। ताजा परिसीमन के पहले इसका अधिकांश हिस्सा बिक्रमगंज के नाम से जाना जाता था, जहां से रामसुभग सिंह, शिवपूजन सिंह, राम अवधेश सिंह, तपेश्वर सिंह, रामप्रसाद सिंह, कांति सिंह, वशिष्ठ नारायण सिंह, अजित सिंह एवं मीना सिंह जीतते रहे हैं।

काराकाट नामक एक गांव है। क्षेत्र के शहर दाउदनगर की ऐतिहासिक पहचान है। यह औरंगजेब के सिपहसालार दाउद खां के नाम पर बसा है। यहां एक किला भी है। सचिवालय गोलकांड में शहीद हुए जगतपति कुमार का गांव खरांटी भी इसी क्षेत्र के ओबरा प्रखंड में पड़ता है।

2014 के महारथी और वोट

उपेंद्र कुशवाहा : रालोसपा : 338892

कांति सिंह : राजद : 233651

महाबली सिंह : जदयू : 76709

संजय केवट : बसपा : 45503

राजा राम सिंह : भाकपा माले : 32686

विधानसभा क्षेत्र

गोह (भाजपा), नवीनगर (जदयू), ओबरा (राजद), नोखा (राजद), डिहरी (राजद), काराकाट (राजद)

Posted By: Amit Alok

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