IIT और निफ्ट से पढ़े दो भाई कबाड़ से बदल रहे किस्मत; इनके बनाए टाइल व फर्नीचर की विदेशों में भी मांग
नवादा के दो भाइयों, आईआईटी दिल्ली के विकास और निफ्ट दिल्ली के राहुल ने अच्छी नौकरी छोड़कर प्लास्टिक कचरे को रीसायकल कर टाइल और फर्नीचर बनाने का स्टार् ...और पढ़ें

फैक्ट्री में कचरा अलग करती महिला। जागरण
राजेश प्रसाद, नवादा। पढ़-लिख कर अक्सर लोग ऊंचे ओहदे वाले नौकरी की तलाश करते हैं, लेकिन नवादा जिला के एक छोटे से गांव के दो भाइयों ने कुछ अलग किया है।
अच्छी नौकरी को छोड़कर स्टार्टअप शुरू कर इन भाइयों ने मिसाल कायम की है। हिसुआ के नरहट गांव के बड़े भाई विकास IIT Delhi से पोस्ट ग्रेजुएट हैं। छोटे राहुल ने NIFT Delhi से टेक्सटाइल डिजाइन में ग्रेजुएट की पढ़ाई की।
दोनों ने दिल्ली में वेस्ट प्लास्टिक को रिसाइकिल कर टाइल और फर्नीचर बनाने का अभिनव स्टार्टअप शुरू किया है। इन्होंने बताया कि उत्पादों की गुणवत्ता उच्च स्तर की होने के कारण इन्हें राष्ट्रपति भवन के सोवेनियर शाॅप में भी जगह मिली है।
खेलो इंडिया के लिए मेडल भी इससे तैयार किए जा चुके हैं। इनके बनाए प्रोडक्ट जर्मीनी, यूएस सहित आठ देशों में फैल चुकी है, जिसे बिहार में खोलने की प्लानिंग की जा रही है।
बिहार सरकार के उद्योग स्टार्टअप में भी शामिल होने का मौका मिला है, जिसके तहत बिहार में ट्राॅफी बनाकर प्रेजेंटेशन दिया गया।
कंपनी में कई लोगों को दिया रोजगार
फिलहाल 15-20 लोगों को कंपनी में रोजगार के साथ-साथ इससे जुड़े करीब 90 से अधिक लोगों के लिए यह रोजगार का माध्यम बन गया है।
कचरे से शुरू हुई यह पहल अब न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण का मजबूत उदाहरण बन रही है, बल्कि स्टार्टअप से फिलहाल सात-आठ दर्जन भर कूड़ा उठाने वालों को नियमित काम और बेहतर आमदनी मिल रही है।
उन्हें उनके श्रम का उचित मूल्य दिलाना ही इस पहल का मुख्य उद्देश्य है। अब वे बिहार में ही एक बड़ा प्लांट स्थापित करने की तैयारी में हैं, जिससे सैकड़ों जरूरतमंद लोगों को रोजगार मिल सके।
स्टार्टअप के तहत प्लास्टिक वेस्ट को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस कर टाइल, फर्नीचर और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाते हैं।
पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन को लेकर जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से ‘प्लास्टिक पे चर्चा’ अभियान भी चलाया जा रहा है।
दोनों भाइयों के मन में यह कॉन्सेप्ट लाॅकडाउन के दौरान आया, जब ऑनलाइन शाॅपिंग बढ़ने से घर-घर प्लास्टिक कचरे का ढेर लगने लगा।
इसी समस्या को अवसर में बदलते हुए घर में ही एक ओवेन में ही इसकी शुरुआत की थी। दोनों ने डिग्री के बाद नौकरी की बजाय उद्यमिता को चुना।
आज स्टार्टअप का टर्नओवर एक करोड़ रुपये से ऊपर तक पहुंच चुका है और उनकी यह पहल युवाओं के लिए प्रेरणा बन रही है।

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