‘तिलकुट मिस करते हो कि नहीं?’ ठंड में प्रवासियों को खल रही बिहारी स्वाद की कमी
Migrant Bihari Winter: मुजफ्फरपुर में मकर संक्रांति से दस दिन पहले ही तिलकुट की बिक्री शुरू हो गई है। बाजार में विभिन्न गुणवत्ता और कीमतों के तिलकुट उ ...और पढ़ें

तिलकुट 400 से 500 रुपये किलो तक बिक रहे हैं। फाइल फोटो
जागरण संवाददाता, मुजफ्फरपुर। Bihari Traditional Food: ठंड की रफ्तार जैसे-जैसे तेज हो रही है, वैसे-वैसे बाहर रह रहे बिहारियों को अपने गांव-घर की याद और ज्यादा सताने लगी है।
मकर संक्रांति में अभी करीब दस दिन बाकी हैं, लेकिन प्रवास में रह रहे बिहारियों के लिए इस ठंड में सबसे ज्यादा जो चीज खल रही है, वह है तिलकुट की कमी। मोबाइल कॉल और वीडियो चैट पर अब सवाल नौकरी या मौसम का नहीं, बल्कि सीधा-सादा होता है—“तिलकुट मिस करते हो कि नहीं?”
मुजफ्फरपुर शहर में तिलकुट का मौसम पूरे शबाब पर है। मकर संक्रांति से करीब पंद्रह दिन पहले ही बाजारों में तिलकुट की दुकानों की रौनक लौट आई है। सरैयागंज, कल्याणी, पानी टंकी चौक, देवी मंदिर इलाके में हर चौक-चौराहे पर तिलकुट बनते और बिकते दिख रहे हैं। शहर में ठंड के साथ तिल और गुड़ की खुशबू घुलने लगी है।
हालांकि इस बार बाजार में कोई नया प्रयोग नहीं है, लेकिन क्वालिटी और दाम में बड़ा फर्क साफ दिख रहा है। काले तिल के महंगे होने से काले तिल की लाई, सफेद तिल की तुलना में ज्यादा कीमत पर बिक रही है।
पानी टंकी चौक के पास जहां सफेद तिल की लाई 300 रुपये किलो और काले तिल की 360 रुपये किलो मिल रही है, वहीं देवी मंदिर के आसपास यही तिलकुट 400 से 500 रुपये किलो तक बिक रहे हैं। साफ है, दाम में एकरूपता नहीं है।
सरैयागंज टावर के पास तिलकुट की दुकानों पर अलग-अलग किस्में लोगों को आकर्षित कर रही हैं। कहीं खोया और गुड़ से तिलकुट बन रहा है, तो कहीं चीनी का इस्तेमाल हो रहा है।
इस सीजन में गया, बिहारशरीफ और नवादा से 500 से अधिक कारीगर बुलाए गए हैं, जो पारंपरिक तरीके से तिलकुट तैयार कर रहे हैं। बाहर से भी तैयार तिलकुट मंगाए गए हैं, जबकि कई ब्रांडेड दुकानों में ड्राईफ्रूट और खोया से बने प्रीमियम तिलकुट ग्राहकों को लुभा रहे हैं।
दुकानदारों का कहना है कि इस एक महीने में करीब पांच करोड़ रुपये के कारोबार की उम्मीद है। जिले में तिल और तिलकुट का यह कारोबार सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि रोज़गार और परंपरा से भी जुड़ा है।
काले और सफेद तिल के भाव इस बार चर्चा में हैं। जहां सफेद तिल 170 रुपये किलो के आसपास बिक रहा है, वहीं काले तिल का भाव 280 रुपये किलो तक पहुंच गया है।
दुकानदार बताते हैं कि नागालैंड, मेघालय और असम में काले तिल की फसल कमजोर होने के कारण इसके दाम में उछाल आया है। वहीं सफेद तिल कानपुर सहित अन्य इलाकों से पर्याप्त मात्रा में आने के कारण सस्ता हुआ है।
इधर, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और कोलकाता जैसे शहरों में काम कर रहे प्रवासी बिहारियों के लिए तिलकुट अब सिर्फ मिठाई नहीं, बल्कि घर की गर्माहट की याद बन गया है।
कई लोग ऑनलाइन ऑर्डर या रिश्तेदारों के हाथ तिलकुट मंगवाने की जुगत में लगे हैं।क्योंकि ठंड में अगर सबसे ज्यादा कुछ याद आता है, तो वह है- गांव का अलाव, मकर संक्रांति और तिलकुट का स्वाद।

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