पूर्वी चंपारण, [शशिभूषण कुमार]। फल व पत्ते काटने के बाद केले के पौधे को बेकार समझ यूं ही फेंक दिया जाता है, लेकिन अब यह रोजगार दे रहा। क्योंकि, इसके तने से धागा बन रहा और उससे कपड़े, बैग, टोपी, सेनेटरी पैड, रस्सी व सजावटी सामान। बचे अवशेष से बनाई जाएगी खाद। पर्यावरण को नुकसान न हो और गरीबों को रोजगार मिले, इसी सोच के साथ पूर्वी चंपारण जिले के हरसिद्धि प्रखंड निवासी पवन श्रीवास्तव इस काम में जी जान से जुटे हैं। फिलहाल 40 महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया है। माह के अंत तक धागे की आपूर्ति शुरू कर दी जाएगी।

धागा बेचने के लिए कोलकाता की एक कंपनी से अनुबंध हुआ है। पवन के काम की वजह से ही उन्हें बीते दिनों पटना में सहकार भारती की ओर से आयोजित कार्यक्रम में सम्मानित किया गया। सहकार भारती के सहयोग से पवन छह माह पहले सूरत गए। वहां तांतीवैली बनाना प्रोसेसिंग एंड प्रोडक्ट्स को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड में केले के तने से धागा, उसके पानी से खेती में इस्तेमाल होने वाला जैविक रसायन व खाद उत्पादन का प्रशिक्षण लिया। गांव लौटे और मशीन लगाने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने कल्पवृक्ष बनाना प्रोसेसिंग एंड प्रोडक्ट्स को-ऑपरेटिव सोसाइटी बनाई। गोढ़वा प्रखंड में पांच मशीनें लगाई हैं। एक की कीमत 80 हजार 850 रुपये है। शेड निर्माण में करीब तीन लाख सहित कुल सात लाख खर्च हुए हैं। जैविक रसायन बनाने वाली मशीन पर आठ लाख खर्च हुए हैं।

40 महिलाओं को दिया गया प्रशिक्षण

 धागा और उससे अन्य सामान बनाने के लिए फिलहाल तीन स्वयंसहायता समूह की 40 महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया है। महिलाएं बैग, टोपी, पायदान, सोफा कवर, टीपैड, सेनेटरी पैड और रस्सी सहित अन्य सामान बना रही हैं। मांग के अनुसार सामग्री बनाई जाएगी। दूसरी ओर, कोलकाता की एक कंपनी से प्रति क्विंटल 11 हजार की दर पर धागा बेचने का अनुबंध हुआ है। मांंग प्रतिमाह सौ क्विंटल है।

केले के एक तने से करीब तीन सौ ग्राम धागा निकलता

 किसानों से वेस्टेज केले का एक पौधा 10 रुपये में खरीदा जाता है। उसके तने से करीब तीन सौ ग्राम धागा निकलता है। तने से निकले पानी से जैविक रसायन और बाकी बचे कचरे से खाद बनेगी। जैविक रसायन का बाजार मूल्य अभी सात सौ रुपये प्रति लीटर है। तीन मशीन, दो मजदूर, एक ट्रैक्टर के सहयोग से एक दिन में एक क्विंटल धागा तैयार किया जा सकता है। इस पर लगभग 54 सौ रुपये खर्च होंगे। जैविक रसायन व खाद जोड़ दिया जाए तो लाभ तीन गुना हो सकता है।

पवन की मानें तो माह के अंत तक धागा निकालने का काम शुरू हो जाएगा। छठ बाद अन्य सामग्री का उत्पादन होने लगेगा। इसके कई उत्पाद प्लास्टिक का विकल्प हो सकते हैं। जो वाशेबल सेनेटरी पैड तैयार हो रहा, उसकी कीमत सौ रुपये है।

कृषि विज्ञान केंद्र, पीपराकोठी के प्रमुख कृषि वैज्ञानिक डॉ. अरविंद कुमार ने कहा कि केले की खेती करने वाले किसानों के लिए यह बेहतर होगा। वे इसके तने से भी आमदनी प्राप्त कर सकेंगे। इससे बहुत से लोगों को रोजगार भी मिल सकेगा।

 

Posted By: Ajit Kumar

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