मेडिकल छात्रों को मिलेगा रीयल मानव शरीर पर प्रशिक्षण, एसकेएमसीएच के एनाटॉमी विभाग का एक्शन प्लान तैयार
Unclaimed bodies medical education: एसकेएमसीएच मुजफ्फरपुर का एनाटॉमी विभाग मेडिकल छात्रों के लिए लावारिस शवों का उपयोग कर प्रशिक्षण देगा। एक टीम पुलिस ...और पढ़ें

Anatomy department action plan: पुलिस, अस्पताल प्रशासन और एफएमटी विभाग से समन्वय कर लावारिस शव लाने की कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के लिए टीम गठित।
जागरण संवाददाता, मुजफ्फरपुर। Medical students cadaver training: मेडिकल शिक्षा को और अधिक व्यावहारिक व गुणवत्तापूर्ण बनाने की दिशा में श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (एसकेएमसीएच) ने बड़ी पहल की है। अब मेडिकल छात्र वास्तविक मानव शरीर पर चीर-फाड़ (डिसेक्शन) का अभ्यास कर सकेंगे। इसके लिए कॉलेज का एनाटॉमी विभाग लावारिस शवों को शैक्षणिक उपयोग में लाने का एक्शन प्लान तैयार कर रहा है।
इस पहल के तहत पुलिस, अस्पताल प्रशासन और फॉरेंसिक मेडिसिन (एफएमटी) विभाग के साथ समन्वय स्थापित कर कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के लिए एक विशेष टीम गठित की जाएगी। यह टीम विभिन्न स्थानों से लाए गए लावारिस शवों की पहचान, कानूनी औपचारिकताओं और निर्धारित समय-सीमा के बाद उन्हें शैक्षणिक उपयोग के लिए एनाटॉमी विभाग तक पहुंचाने का काम करेगी।
एनाटॉमी विभागाध्यक्ष डॉ. शोभा कुमारी ने बताया कि चिकित्सक बनने के लिए मानव शरीर की आंतरिक संरचना का प्रत्यक्ष और व्यावहारिक ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। इस योजना के लागू होने से एमबीबीएस और पीजी छात्रों को वास्तविक कैडेवर पर डिसेक्शन करने का पर्याप्त अवसर मिलेगा। एक शव पर औसतन 10 से 12 छात्र अभ्यास कर सकेंगे, जिससे उन्हें नसों, मांसपेशियों और विभिन्न अंगों की सूक्ष्म संरचना को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।
एसकेएमसीएच की प्राचार्य डॉ. आभा रानी सिन्हा के अनुसार, गठित टीम एसकेएमसीएच पुलिस ओपी और अस्पताल प्रशासन के साथ लगातार संपर्क में रहेगी। एफएमटी विभाग के माध्यम से 72 घंटे की कानूनी प्रतीक्षा अवधि पूरी होने के बाद शवों को विशेष रसायन (फॉर्मलिन) से संरक्षित किया जाएगा, ताकि उन्हें लंबे समय तक पढ़ाई के उपयोग योग्य बनाया जा सके।
कैडेवर की कमी होगी दूर
मेडिकल कॉलेजों में लंबे समय से कैडेवर की कमी एक बड़ी चुनौती रही है, जिसके कारण छात्रों को चार्ट और मॉडल के सहारे पढ़ाई करनी पड़ती है। एनाटॉमी विभाग का मानना है कि इस नई व्यवस्था के लागू होने से शवों की उपलब्धता सुनिश्चित होगी। इसका लाभ केवल एनाटॉमी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सर्जरी, आर्थोपेडिक्स और ईएनटी जैसे विभागों के छात्र भी नई सर्जिकल तकनीकों का अभ्यास कर सकेंगे।
कॉलेज में एमबीबीएस, डीएनबी के साथ पीजी और पोस्ट डीएनबी सीटों की संख्या बढ़ने के कारण इस पहल को और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। साथ ही कॉलेज प्रशासन लावारिस शवों के साथ-साथ देहदान को लेकर भी लोगों को जागरूक कर रहा है। अधिकारियों का कहना है कि समाज के सहयोग से चिकित्सा शिक्षा और चिकित्सा विज्ञान को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है।

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