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    गयाजी में फैली त‍िलकुट की सोंधी खुशबू; डंगरा वाले उत्‍पाद का तो कहना ही क्‍या, ख‍िंचे चले आते खरीदार

    By Sanjay Kumar Edited By: Vyas Chandra
    Updated: Sat, 03 Jan 2026 05:54 PM (IST)

    गयाजी में तिलकुट की सोंधी खुशबू फैल रही है, जो डेढ़ सौ साल पुराना उद्योग है और हजारों परिवारों को रोजगार देता है। मकर संक्रांति पर इसकी भारी मांग रहती ...और पढ़ें

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    गयाजी में त‍िलकुट तैयार करते कारीगर। जागरण

    जागरण संवाददाता, गयाजी। शहर की गलियों में इन दिनों तिलकुट की सोंधी खुशबू लोगों को अपनी ओर आकर्षित रही है। करीब डेढ़ सौ वर्ष पुराना यह उद्योग आज बड़ा रूप लेकर जिले की पहचान बन चुका है।

    तिलकुट न सिर्फ स्वाद के लिए मशहूर है, बल्कि हजारों परिवारों के लिए रोजगार का बड़ा आधार भी है। इसके बावजूद यह पारंपरिक उद्योग अब तक जीआई टैग से वंचित है। 

    जिले में पांच हजार से अधिक परिवार तिलकुट उद्योग से जुड़े हुए है। सिर्फ शहर में 250 तिलकुट की दुकानें संचालित हो रही है।

    मुख्यरूप से शहर के रमना रोड, टिकारी रोड, स्टेशन रोड में काफी दुकानें हैं। मकर संक्रांति करीब आते ही तिलकुट की बिक्री खूब रही है।

    इस सीजन में रोजाना 50 क्‍वि‍ंटल तिलकुट की खपत हो रही है। टिकारी रोड़ स्थित तिलकुट विक्रेता धीरेंद्र केशरी ने कहा कि 14 जनवरी यानी मकर संक्रांति तक तिलकुट की बिक्री जमकर हो रही।

    बाजार में कई तरह के चीनी, गुड़, ड्राईफ्रूट और खोवा का बना तिलकुट है, लेकिन लोगों की पहली पसंद चीनी और गुड़ का तिलकुट है।

    तिलकुट पूरी तरह से हाथ से तैयार किया जाता है। इसमें मशीन का उपयोग नहीं किया जाता है। इसी कारण तिलकुट पूरी तरह से लोकल प्रोडक्ट माना जाता है।

    तिल आता दूसरे प्रदेश से

    तिलकुट बनाने के लिए तिल दूसरे प्रदेश यानी उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और झारखंड से आता है। जिले में भी तिल की खेती कुछ दिनों से होने लगी है, लेकिन यहां उपज कम है।

    तिलकुट बनाने के लिए तिल को कहाड़ी में भूनना, गुड़ या चीनी की चाशनी में सही तापमान पर मिलना और फिर हथौड़ी से कूटकर गोल आकर देना हर चरण में कारीगरी और कौशल की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि तिलकुट का स्वाद वर्षो से एक जैसा बना हुआ है।

    क‍ितने में बिक रहा गया का त‍िलकुट

    बाजार में तीन सौ लेकर चार सौ रुपये प्रति किलो तिलकुट बिक रहा है। जितना अधिक खस्ता होता है उसका दाम अधिक है।

    तिलकुट को खस्ता बनाने के लिए तिल का इस्तेमाल अधिक किया जाता है। यही कारण है सीजन में गयाजी का तिलकुट राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास और मुख्यमंत्री आवास तक जाता है। साथ ही दूसरे कई देशों में भी में तिलकुट की सोंधी खुशबू लोगों की पहली पसंद बना है।

    डंगरा का तिलकुट स्वाद और खुशबू से देश-विदेश में पहचान

    मोहनपुर प्रखंड के डंगरा बाजार की सोंधी खुशबू अब सिर्फ इलाके तक सीमित नहीं, बल्कि देश-विदेश तक पहुंच रही है।

    ठंड के मौसम में यहां के कई दुकानदार पारंपरिक तरीके से तिलकुट बनाने में जुटे हैं। डंगरा के तिलकुट की खासियत इसकी जबरदस्त खस्ता और शुस्वाद है, जिसे लोग सर्दी के दिनों में बड़े चाव से खाते हैं।

    मान्यता है कि तिल और गुड़ से बनी मिठाइयां ठंड को दूर करती हैं। डंगरा के तिलकुट का स्वाद यहां के पानी और शुद्ध सामग्री के कारण अलग पहचान रखता है।

    बोधगया आने वाले विदेशी पर्यटक भी डंगरा का तिलकुट पसंद करते हैं। जिससे इसकी ख्याति विदेशों तक फैल रही है।