Saraswati Puja 2026: बक्सर में जोरों पर सरस्वती पूजा तैयारी, बंगाल-राजस्थान के कलाकार गढ़ रहे जीवंत मूर्तियां
बक्सर के डुमरांव में सरस्वती पूजा की तैयारियां जोरों पर हैं। 23 जनवरी को होने वाली पूजा के लिए पश्चिम बंगाल और राजस्थान के मूर्तिकार डेढ़-दो महीने पहल ...और पढ़ें

बक्सर में जोरों पर सरस्वती पूजा तैयारी
संवाद सहयोगी, डुमरांव (बक्सर)। सरस्वती पूजा को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। 23 जनवरी को विद्या की देवी मां सरस्वती की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी। शहर से लेकर गांव तक पूजा समितियों और शिक्षण संस्थानों में उत्साह का माहौल है।
इसी के साथ मूर्तिकारों की कार्यशालाओं में दिन-रात मेहनत का दौर जारी है। मिट्टी, रंग और सांचे के बीच कलाकार मां शारदे की ऐसी प्रतिमाएं गढ़ रहे हैं, जिनमें आस्था के साथ कला की जीवंत झलक दिखाई देती है।
डेढ़-दो महीने पहले से शुरू हो जाती है तैयारी
सरस्वती पूजा की तैयारी डेढ़ से दो महीने पहले ही शुरू हो जाती है। कारण यह है कि पूजा के समय प्रतिमाओं की मांग इतनी अधिक हो जाती है कि कलाकारों के लिए तत्काल सभी को मूर्ति उपलब्ध करा पाना मुश्किल हो जाता है।
इसी वजह से मूर्तिकार महीनों पहले से प्रतिमाएं बनाना शुरू कर देते हैं, ताकि कोई भी खाली हाथ न लौटे। इस वर्ष भी यही तस्वीर देखने को मिल रही है।
पश्चिम बंगाल से आते हैं कलाकार
पश्चिम बंगाल के वर्द्धमान से पिछले 10 वर्षों से आ रहे मुख्य कलाकार लखन पाल अपनी टीम के साथ इस बार भी लगभग एक सौ से अधिक प्रतिमाएं आर्डर पर तैयार कर रहे हैं। उनके साथ मूर्तिकार नारायण पाल, बाबू पाल और सोमनाथ पाल शामिल हैं।
कलाकारों ने बताया कि वे डेढ़ माह पहले ही यहां आकर काम में जुट जाते हैं। मुख्य कलाकार के द्वारा सभी सहयोगी कलाकारों को उनकी दक्षता के अनुसार न्यूनतम 20 हजार से लेकर 50 हजार रुपये तक मेहनताना दिया जाता है।
नए डिजाइन अलग-अलग आसन, मेहनत के बाद सीमित बचत
राजस्थान के पाली अजमेर से दूसरी बार डुमरांव आए मूर्तिकार दिनेश कुमार अपनी टीम के साथ प्लास्टर आफ पेरिस से सांचे में ढालकर प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं। उनके साथ दुधा राम और दौलत राम भी काम कर रहे हैं।
मूर्तिकारों का कहना है कि इस वर्ष वे नए-नए डिजाइन की प्रतिमाएं बना रहे हैं। इनमें मां शारदे को हंस, कमल, शंख, चक्र, रथ और वीणा जैसे विविध आसनों पर विराजमान दिखाया गया है।
मूर्तिकार दिनेश कुमार ने बताया कि पिछले कई वर्षों से नटराज शैली की प्रतिमाओं की मांग लगातार बढ़ी है। इसमें प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमा पर विशेष पेंटिंग की जाती है, जिससे दूर से देखने पर भी प्रतिमा अत्यंत आकर्षक लगती है। उन्होंने कहा कि डेढ़ माह की कड़ी मेहनत के बाद अंत में सभी खर्च निकालने पर डेढ़ से दो लाख रुपये तक की बचत हो पाती है।
मूर्ति निर्माण कार्य संपन्न होने के बाद यही कलाकार आगे हैदराबाद और महाराष्ट्र का रुख करते हैं, जहां वे भगवान गणेश और मां दुर्गा की प्रतिमाओं के निर्माण में जुट जाते हैं। सच कहा जाए तो सरस्वती पूजा की चमक-दमक के पीछे इन मूर्तिकारों की महीनों की तपस्या और समर्पण छिपा है, जो हर वर्ष आस्था को आकार देने का काम करते हैं।

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