मनरेगा से लगाए गए पौधे बने ‘ऑक्सीजन एटीएम’, एक दशक बाद राहगीरों को दे रहे प्राणवायु और छाया
बिहार के शाहपुर प्रखंड में मनरेगा के तहत एक दशक पहले लगाए गए पौधे अब विशाल पेड़ों का रूप ले चुके हैं। ये पेड़ राहगीरों को प्राणवायु और घनी छाया प्रदान ...और पढ़ें

मनरेगा से लगाए गए पौधे
संवाद सूत्र, शाहपुर (भोजपुर)। धर्मग्रंथों और शास्त्रों में कहा गया है कि पौधे पुत्र के समान होते हैं, जो बड़े होकर समाज और मानवता की सेवा करते हैं। यह कथन शाहपुर प्रखंड क्षेत्र में मनरेगा के तहत लगाए गए पौधों पर पूरी तरह सटीक बैठता है। करीब एक दशक पहले लगाए गए ये पौधे आज विशाल पेड़ों का रूप धारण कर चुके हैं और लोगों को ऑक्सीजन, छाया और सुकून प्रदान कर रहे हैं। यही कारण है कि स्थानीय लोग इन्हें अब “ऑक्सीजन एटीएम” कहने लगे हैं।
शाहपुर-करनामेपुर पथ पर सहजौली गांव के समीप सड़क के दोनों किनारों पर लगभग दो किलोमीटर की दूरी में लगाए गए पौधे आज हरियाली की अनुपम मिसाल बन चुके हैं।
वर्ष 2013-14 के दौरान मनरेगा की सामाजिक वानिकी योजना के तहत इन छायादार पौधों का रोपण किया गया था। उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि आने वाले वर्षों में यही पौधे पर्यावरण संरक्षण की मजबूत ढाल बन जाएंगे।
समय के साथ ये पौधे अब पूरी तरह पेड़ों में तब्दील हो चुके हैं। इन पेड़ों की गोलाई चार से पांच फीट तक पहुंच गई है, जबकि ऊंचाई करीब 20 फीट या उससे अधिक हो चुकी है।
घने और पत्तीदार इन पेड़ों की खासियत यह है कि ये सूर्य की तीखी किरणों को रोक लेते हैं। गर्मी के मौसम में राहगीरों, साइकिल और पैदल चलने वालों को इनकी छांव बड़ी राहत देती है। आसपास के किसान भी दोपहर के समय इन पेड़ों की छाया में सुस्ताते नजर आते हैं।
इन पेड़ों का असर केवल गर्मी तक सीमित नहीं है। सर्दियों में भी इनके नीचे का तापमान आसपास के खुले स्थानों की तुलना में अधिक रहता है, जिससे लोगों को ठंड से कुछ हद तक राहत मिलती है।
पेड़ों के बीच से गुजरने वाली सड़क पर चलते समय एक अलग ही अनुभूति होती है, मानो प्राकृतिक हरित सुरंग से गुजर रहे हों।
इन पौधों के संरक्षण और देखरेख में तत्कालीन मुखिया आरती देवी और उनके स्वर्गीय पति अजित ओझा की भूमिका उल्लेखनीय रही। पौधों को बचाने और नियमित सिंचाई के लिए कई स्थानों पर चापाकल गड़वाए गए थे।
साथ ही, पौधों की सुरक्षा के लिए वन पोषकों की भी तैनाती की गई थी। मुखिया पति द्वारा पौधों की रखवाली और देखरेख पूरी शिद्दत से की गई, जिसका परिणाम आज सभी के सामने है।
प्रारंभिक वर्षों में पौधों को पशुओं से बचाने के लिए विशेष ध्यान दिया गया। जब पौधे बड़े होकर जानवरों की पहुंच से बाहर हो गए, तब उन्होंने तेजी से विकास किया और धीरे-धीरे पेड़ों का रूप ले लिया।
वर्तमान में इन छायादार पेड़ों की संख्या पांच सौ से सात सौ के बीच बताई जा रही है। इसी दौरान मजदूरों द्वारा पीपल और अन्य उपयोगी प्रजातियों के पौधे भी लगाए गए, जिससे जैव विविधता को बढ़ावा मिला।
मनरेगा के प्रखंड कार्यक्रम पदाधिकारी अवधेश कुमार ने बताया कि यह मनरेगा की बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि इस तरह के पौधारोपण कार्य आज भी जारी हैं और इससे आम लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूपों में लाभ मिलता है।
ये पेड़ न केवल पर्यावरण को शुद्ध कर रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित विरासत भी छोड़ रहे हैं।

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