मकर संक्रांति से पहले कोईलवर बाजारों में तिलकुट की खुशबू, कीमतें पिछले साल जैसी ही
कोईलवर के बाजारों में मकर संक्रांति से पहले तिलकुट की खुशबू फैल गई है। तिल-गुड़ से बने पारंपरिक व्यंजनों की मांग बढ़ गई है। गया और जहानाबाद से आए कारी ...और पढ़ें

मकर संक्रांति से पहले कोईलवर बाजारों में तिलकुट की खुशबू
संवाद सूत्र, कोईलवर(आरा)। ठंड की दस्तक के साथ ही इलाके के बाजारों में तिलकुट की सौंधी खुशबू फैलने लगी है। मकर संक्रांति में कुछ ही दिन का समय बच गया है, अभी से ही तिल-गुड़ से बने पारंपरिक व्यंजनों की मांग तेज हो गई है।
कोईलवर, चांदी, कायमनगर, जमालपुर, बीरमपुर और बबुरा सहित आसपास के इलाकों में तिलकुट की दुकानें सजने लगी हैं। गुड़ और चीनी से बने तिलकुट, बादाम पट्टी और लाई की बिक्री में भी लगातार तेजी देखी जा रही है। पिछले कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में बाहर से कारीगर बुलाकर बड़े पैमाने पर तिलकुट निर्माण का काम किया जा रहा है।
प्रतिदिन एक क्विंटल तिलकुट की खपत
बाजार में मांग का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि डेढ़ महीने के कारोबार में प्रतिदिन लगभग एक क्विंटल तक तिलकुट की खपत हो जाती है।
कोईलवर के व्यवसायी राहुल कुमार ने बताया कि तिलकुट निर्माण के लिए गयाजी, जहानाबाद जिले से कारीगर बुलाए गए हैं।कोईलवर स्थित तिलकुट कारखाने में लगभग डेढ़ दर्जन कारीगर और मिस्त्री को रोजगार भी मिल रहा है। जो प्रतिदिन सुबह छह बजे से रात आठ बजे तक भट्ठी जलती है और कारीगर रोजाना एक क्विंटल से ज्यादा तिलकुट तैयार करते हैं।
एक क्विंटल तिलकुट बनाने में लगभग चालीस किलो तिल, साठ किलो चीनी, दस से पंद्रह किलो गुड़ के साथ इलायची और सौंफ का उपयोग किया जाता है। तिल को भूरा होने तक भूनकर गुड़-चीनी की चाशनी में मिलाकर पीट कर तिलकुट बनाया जाता है। निर्माण के दौरान साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है।
प्रतिकिलो दाम में कोई बढ़ोतरी नहीं
बढ़ती महंगाई का असर तिलकुट के दामों पर भी पड़ा है। इस वर्ष जीएसटी में कमी का असर यह पड़ा है कि प्रतिकिलो कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। बाजार में तिलकुट दो सौ से 220 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है, जबकि लाई लगभग साठ से सत्तर रुपये और बादाम पट्टी दो सौ रुपये प्रति किलो में उपलब्ध है।
ठंड में तिल खाने से शरीर में गर्माहट मिलती है, इसलिए लोग तिलकुट, तिल के लड्डू जैसे व्यंजनों का खूब सेवन कर रहे हैं। संक्रांति के मौके पर तिल को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा के कारण भी इसकी बिक्री जोरों पर है।

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