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    फैशन के दौर में सिमटता गड़ेरिया समाज, आर्थिक तंगी और पलायन से जूझते परिवार; सरकार से भी कोई सहारा नहीं

    Updated: Sun, 04 Jan 2026 02:31 PM (IST)

    गड़हनी (आरा) में गड़ेरिया समुदाय का पुश्तैनी कंबल बुनाई का पेशा फैशन और आर्थिक तंगी के कारण सिमट रहा है। भेड़ के बालों की कीमत गिरने और खादी ग्रामोद्योग ...और पढ़ें

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    फैशन के दौर में सिमटता गड़ेरिया समाज

    अरुण कुमार यादव, गड़हनी (आरा)। सर्दी की हाड़ कंपाती व बर्फीली रात पेड़ों के नीचे काट लेने की आदत। सावन-भादो की झमाझम बारिश में भी बेफिक्र पगडंडियों पर भेड़ चराने वाले गड़ेरियों का जज्बा अब जवाब देने लगा है। कंबल बुनने का गड़ेरियों का पेशा अंतिम सांसे गिन रहा है। बहुतेरे गड़रिये नए काम की खोज में पलायन कर गए। 

    बहुतों ने पेशा बदल दिया। पर अभी दर्जनों परिवार पुश्तैनी परंपरा व पेशा को संभाले हुए हैं।आर्थिक तंगी से दर्जनों गडेरी परिवार के सामने दो जून की रोटी के भी लाले हैं। एक समय में गड़हनी में कम्बल उद्योग भी था, जो कई वर्षों से बंद पड़ा है। 

    5 रुपये किलो भी कोई नहीं लेता भेड़ के बाल

    तेंदुनी निवासी श्रीकिशुन पाल बताते है कि जब गड़हनी में खादी ग्रामोद्योग चलता था तो भेड़ों के बाल को वहां देते थे। दर्जनों महिलाएं सुत काट कर कम्बल बुनती थी। अब तो भेड़ के बाल भी कोई नहीं लेता। पहले भेड़ के बाल 15 रुपये किलो था ,अब 5 रुपये भी कोई नहीं लेता है। 

    उन्होंने कहा कि घर के बूढ़े व प्रौढ़ भेड़ों को चराने के लिए वर्ष के अधिकांश महीने खानाबदोशी जीवन ही बिताते हैं। वराप के बंधु पाल ने बताया कि फैशन के चकाचौंध में गड़ेरियों का पुश्तैनी पेशा सिमट रहा है। सरकार ने भी इनके पेशा व कौशल को बरकरार रखने की कोई जुगत नही दिखाई। न ही किसी प्रकार का आर्थिक लाभ व न ही किसी प्रकार का कोई प्रोत्साहन पैकेज दिया। 

    पुश्तैनी पेशा के अस्तित्व की चिंता 

    गड़हनी प्रखण्ड के लालगंज तेंदुनी, धमनिया, रामडीहरा, वराप, बहरी सहित कई गांवों में निवास करने वाले गड़ेरियों के परिवारों के समक्ष पुश्तैनी पेशा के अस्तित्व की चिंता के साथ रोजी-रोटी की चिंता भी सता रही है। बनवारी पाल ने बताया कि भेड़ का उपयोग अब मांस बाजार में होने लगा है। भेड़ की मांस की कीमत 800 रुपये से 1200 रुपये किलो तक है। 

    उन्होंने बताया कि दूसरे प्रदेश के लोग बाहर से आते है और भेड़ को खरीद लेते हैं और ले जाते हैं। उन्होंने कहा कि फैशन के इस दौर में अब भेड़ के बाल से बने कम्बल का कोई महत्व नही है।